श्रीमद भगवद् गीता अध्याय ११ विश्वरूप योग डॉ प्रणव पंड्या द्वारा व्याख्या

 

गीता अध्याय ११ विश्वरूप योग भूमिका

डॉ प्रणव पंड्या द्वारा व्याख्या

नर को नारायण का स्वरूप बोध करना कठिन काम है। संसार और सांसारिक बंधन बाधक बन जाते है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस बात को अर्जुन को समझाने का पूरा प्रयत्न किया। श्रीमद भगवद् गीता एक मात्र ग्रन्थ है जिसमें भगवान स्वयं ब्रह्मविद्या और योग शास्त्र का ज्ञान सारे संसार को देते हैं।

गीता के हर अध्याय के अंत में:

ॐ तत् सत इति श्रीमद् भगवद् गीता उपनिषदत्सु ब्रह्म विद्यायाम् योगशास्त्रे श्रीकृष्ण-अर्जुन संवादे विश्व स्वरूप दर्शन योगोनाम …अध्याय:

यही गीता का वास्तविक परिचय है। अर्जुन की चेतना को जाग्रत करने के लिए गीता के अध्याय दर अध्याय, कृष्ण प्रयत्न करते हैं। गीता के अध्याय २ के ७ वे श्लोक में जब अर्जुन ने कृष्ण को अपना गुरु मान लिया और कृष्ण के शरणागत हो गया तब से कृष्ण और अर्जुन के संवाद शुरू हुए। अध्याय २ से अध्याय १० तक कृष्ण अर्जुन की शंकाओं का समाधान कर रहे थे। कृष्ण अपनी अनेकों-अनेक विभूतियाँ के बारे में बता रहे थे। इस बीच में कृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग, भक्ति योग, उपनिषदों का सार समझा रहे थे। परमात्मा और जीवात्मा का सम्बन्ध एकरस रहता है। यह सम्बन्ध शाश्वत है। अर्जुन की चेतना को ऊपर उठाते हुए अध्याय ६ में ध्यान अवस्था के बारे में, अध्याय ७ में परा-भौतिक और वैज्ञानिक तर्क के भक्ति का महत्व, अध्याय ८ में भगवान को कैसे और किस - किस तरीके से याद  रखना अध्याय ९ में भगवान का काम करने का तरीका, कैसे वे अपने भक्तों और जन साधारण के लिए   (योग-क्षेम) उत्तम कर्म करते हैं। कितना भी बड़ा पापी हो उसको भी जब वह भगवान की शरण ने आता है तो मुक्ति मिल जाती है। गीता के १० अध्याय में भगवान ने स्वयं अपनी विभूतियों का वर्णन किया।

अब तक भगवान श्रीकृष्ण ने यह बता दिया कि वे एक व्यक्ति नहीं हैं, वे एक विराट स्वरूप है। योगमाया से उनका स्वरूप ढका रहता है। मगर वे योगमाया के परे हैं। अर्जुन ने कृष्ण को एक मित्र, व्यक्ति, सम्बन्धी, गुरु, और उनकी सारी विभूतियों को पहचान लिया, या जान लिया। अब अर्जुन भगवान श्री कृष्ण के असली स्वरूप, या वास्तविक स्वरूप को जानना चाहता है। भगवान का यह स्वरूप साधारण आँखों से नहीं देखा जा सकता इसके लिए अर्जुन को दिव्य दृष्टि की जरूरत होगी।

रामचरित मानस में भी भगवान राम ने अपनी माता कौशल्या को अपना विराट रूप दिखाया था (एक भजन है – भये प्रगट कृपाला, दीनदयाला.......) बालकाण्ड।

मानस के उत्तर-काण्ड (७९-८०) में एक प्रसंग है जब काकभुशुण्डि जी राम के पेट में चले जाते हैं और वहां जो देखते हैं उसे वे गरुड़ जी को सुना रहे हैं।

कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा ॥

अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला ॥३॥

सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा ॥

सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर ॥४॥

करोड़ों ब्रह्माजी और शिवजी, अनगिनत तारागण, सूर्य और चंद्रमा, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि,

असंख्य समुद्र, नदी, तालाब और वन तथा और भी नाना प्रकार की सृष्टि का विस्तार देखा। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर तथा चारों प्रकार के जड़ और चेतन जीव देखे।

जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ ।

सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ ॥८०क॥

जो कभी न देखा था, न सुना था और जो मन में भी नहीं समा सकता था (अर्थात जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी), वही सब अद्भुत सृष्टि मैंने देखी। तब उसका किस प्रकार वर्णन किया जाए !

एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक ।

एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक ॥८०ख॥

मैं एक-एक ब्रह्माण्ड में एक-एक सौ वर्ष तक रहता। इस प्रकार मैं अनेकों ब्रह्माण्ड देखता फिरा।

यह विराट स्वरूप ही भगवान का वास्तविक स्वरूप है। अभी तक तो भगवान अर्जुन की शंकाओं का समाधान कर रहे थे, पर इस ११वें  में श्रीकृष्ण, अर्जुन को अपने विराट स्वरूप का अनुभव कराएंगे। चर्चा और अनुभूति में बहुत अंतर है।

इस प्रकार दसवें अध्याय के अन्त में भगवान ने अर्जुन पर विशेष कृपा करके कहा कि सम्पूर्ण जगत अर्थात अनन्त सृष्टियाँ मेरे किसी एक अंश में है और वह मैं तेरा सारथी बना हुआ तेरे घोड़ों की लगाम और चाबुक लेकर बैठा हूँ तथा तेरी आज्ञा का पालन कर रहा हूँ! जब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्वामी तेरे सामने बैठा हुआ है तब तुझे मेरी अलग-अलग विभूतियों को जानने की क्या आवश्यकता है?  

यहाँ से गीता का एकोदशोअध्याय (११) अध्याय शुरू होता है। 

विश्वरूप के दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक १

अर्जुन उवाच

मदनुग्रहाय, परमम्, गुह्यम्, अध्यात्मसञ्ज्ञितम्‌ ।

यत् त्वया उक्तम् वचः तेन मोहः अयम् विगतः मम  ॥१॥

अर्जुनः उवाच – अर्जुन ने कहा;

मत्-अनुग्रहाय त्वया यत् परमम् गुह्यम् – केवल मुझ पर कृपा करने के लिए आपने जो परम गोपनीय;

अध्यात्म संज्ञितम् वचः उक्तम् – आध्यात्म – विषयक वचन कहे,

तेन मम अयम् मोहः विगतः – उससे मेरा यह मोह नष्ट हो गया है।

(गीता के सारे छन्द ३२ अक्षरों वाले हैं – पर इस श्लोक में ३३ अक्षर आएँ हैं)

अर्जुन बोले- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन अर्थात उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है।

Arjuna said: The supreme mystery, the discourse concerning the Self which thou hast given out of grace for me-by this my bewilderment is gone from me.

The illusion that things of the world exist in themselves and maintain themselves, that they and move apart from God has disappeared.

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक २

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।

त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यम् अपि च अव्ययम्‌ ॥२॥

हि कमल-पत्र-अक्ष भूतनाम् भव अप्ययौ – क्योंकि हे कमल नयन! सम्पूर्ण प्राणियों के उत्पत्ति तथा विनाश;

मया विस्तरशः त्वत्तः श्रुतौ - मैंने विस्तार पूर्वक आपसे ही सुने हैं;

च अव्ययम् माहात्म्यम् अपि – और आप का अविनाशी माहात्म्य भी सुना है। 

क्योंकि हे कमल-नेत्र! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है।

The birth and passing away of things have been heard by me in detail from Thee, O Lotus-eyed Krsna., as also Thy imperishable majesty.

डॉ प्रणव पंड्या: गीता के ७-८-९ अध्याय में जो रहस्यमय अध्यात्मिक ज्ञान  अर्जुन को मिला उससे उसका मोह नष्ट हो गया। अब अर्जुन भगवान के वास्तविक स्वरूप को देखने के लिए तैयार है। अर्जुन श्रीकृष्ण को कहते है कि, “हे प्रभु आपने मुझ पर बड़ी कृपा की।

भगवान प्रसन्न कैसे होते है? साधना से या फिर सिर्फ कृपा से? साधना इतनी हो की कृपा अनुभव होने लगे। प्रभु का कोई मोल नहीं। समर्पण भाव से की गयी साधना पात्रता को विकसित करती है। अर्जुन धीरे - धीरे एक सच्चे भक्त  के रूप में विकसित हो रहा है, विनम्र, सुपात्र, सत्पात्र शिष्य. इस अध्यात्मिक विकास ने अर्जुन के मन को बदल दिया। अब वह भगवान में विश्वास करने लगा।

अर्जुन कहता है, ‘हे प्रभु मैंने धर्म ग्रंथों में आपके बारे में पढ़ा है। हे कमल-नेत्र परमेश्वर आप ही जीवन की उत्पत्ति और संहार का कारण हो। मैंने आपकी महिमा के बारे में बहुत सुना है। जो आप कह रहे हो स्वयं के बारे में, वो सिर्फ भगवान ही कह सकते हैं।‘

मानस अयोध्याकाण्ड १२६, १-२

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥

तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥१॥

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥

तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥२॥

हे राम! जगत् दृश्य है, आप उसके देखने वाले हैं। आप ब्रह्मा, विष्णु और शंकर को भी नचाने वाले हैं। जब वे भी आपके मर्म को नहीं जानते, तब और कौन आपको जानने वाला है?

वही आपको जानता है, जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनंदन! हे भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले चंदन! आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते हैं।

"प्रभु! आप जिसको स्वयं आप के बारे में बता दें केवल वो ही आपको जान पाता है। जो आपके बारे में जान पाता है वो ही आप में घुल मिल जाता है" (वो स्वयं भगवान बन जाता है)

अर्जुन कह रहे हैं कि हे प्रभु आपने अपने स्वयं के बारे में जो कहा है,  (आत्मानं – अपने; यथा – जिस प्रकार; आत्थ – कहा), यह सब सत्य है और इसका आपने ने विभूति वर्णन में बताया है, परन्तु हे प्रभु मैं आपका ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य, तेज युक्त स्वरूप को अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ३

एवम् एतत् यथा आत्थ त्वम् आत्मानम् परमेश्वर।

द्रष्टुम् इच्छामि ते रूपम् ऐश्वरम् पुरुषोत्तम  ॥३॥

पुरुषोत्तम – हे पुरुषों में उत्तम!

त्वम् आत्मानम् यथा आत्थ एतत् एवम् – आप अपने-आपको जैसा कहते हैं यह वास्तव में ऐसा ही है।

परम-ईश्वर – हे परमेश्वर!

ते ऐश्र्वर्यम् रूपम् द्रष्टुम् इच्छामि – आपके ईश्वर सम्बन्धी रूप को मैं देखना चाहता हूँ।

हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।

As Thou hast declared Thyself to be, O Supreme Lord, even so it is. (But) I desire to see Thy divine form, O Supreme Person.

It is one thing to know that the Eternal Spirit dwells in all things and another to have the vision of it. Arjuna wishes to see the Universal Form, the visible embodiment of the Unseen Divine how He is the “birth and passing away of all beings” as stated in chapter 10 verse 8. The abstract metaphysical truth should be given visible reality. 

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ४

मन्यसे यदि तत् शक्यम् मया द्रष्टुम् इति प्रभो।

योगेश्वर ततः मे त्वम् दर्शय आत्मानम् अव्ययम् ॥४॥

प्रभो – हे प्रभु!

मया तत् द्रष्टुम् शक्यम् इति यदि मन्यसे – मेरे द्वारा आपका वह ईश्वर-रूप देखा जा सकता है, ऐसा अगर आप मानते हैं,

ततः योगेश्वर त्वम् आत्मानम् अव्ययम् मे दर्शय – तो हे योगेश्वर ! आप अपने उस अविनाशी स्वरूप को मुझे दिखा दीजिये।

हे प्रभो! (उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय तथा अन्तर्यामी रूप से शासन करने वाला होने से भगवान का नाम 'प्रभु' है) यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य (सम्भव हो सकता) है- ऐसा आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर! उस अविनाशी स्वरूप का मुझे दर्शन कराइए।

If Thou, O Lord, thinkest that by me, It can be seen then reveal to me, Thy imperishable Self, O Lord of yoga Krsna

डॉ प्रणव पंड्या : श्लोक ३ और ४ –

जो प्रश्न अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से किया वही प्रश्न १९वि सदी में स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस से किया था। गुरु ने मुस्कराते हुए विवेकानन्द को सिर्फ स्पर्श से प्रकृति और पुरुष का अलौकिक नृत्य दिखाना शुरू किया। इस दृश्य को देख कर विवेकानन्द डर गए। जो मनुष्य परमात्मा को समर्पित है वो ही इस प्रकार परमात्मा का दिव्य स्वरूप की एक झलक देख पाते हैं। अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण का ऐसा ही शिष्य था. इसलिए उसने बड़ी विनम्रता से पूछा, कि हे प्रभु यदि मैं आपके दिव्य स्वरूप को देखने की पात्रता रखता हूँ तो (दृश्टुम शक्यम्), तो कृपा करके आप अपना अविनाशी रूप दिखाएँ।

आत्मानं अव्ययम में दर्शय।

यहां अर्जुन ने एक अच्छे शिष्य की पहचान दिखाई। वो कहता है, “यदि सम्भव हो सके तो”। मैं आपको बाध्य नहीं कर रहा हूँ। यदि मैं लायक हूँ तो कृपा कर के मुझे अपना दिव्य स्वरूप दिखाएँ। गुरु चाहते हैं कि शिष्य पूर्ण रूप से तैयार हो. वो चाहते है कि शिष्य संस्कार रहित, कर्म राग विहीन चित्त, शुद्ध रूप से तैयार हो। परम अनुभव के लिए तैयारी चाहिए। तपस्या/ पवित्रता/ परिष्कार/  मजबूत मानसिकता वाला हो।

अर्जुन कहता है, हे प्रभु में पूर्ण रूप से तैयार हूँ, कृपया मेरी प्रार्थना स्वीकार करें।

अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण का विश्वरूप के दर्शन हेतु प्रार्थना की। अर्जुन ने कहा “हे प्रभु! मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन अर्थात उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है। क्योंकि हे कमल-नेत्र! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है। हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।”

हे प्रभो! यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना सम्भव हो सकता है - ऐसा आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर! उस अविनाशी स्वरूप का मुझे दर्शन कराइए।”

तब भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपने विश्व रूप का वर्णन करते हुए अर्जुन से कहते हैं:

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ५

श्रीभगवानुवाच

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।

नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥५॥

श्रीभगवान् उवाच - भगवान् ने कहा,

अथ मे नाना-विधानि च नाना वर्ण आकृतीनि – अब मेरे अनेक तरह के और अनेक वर्णों याने रंगों तथा आकृतियों वाले,

शतशः सहस्रशः दिव्यानि रूपाणि पश्य – सैकड़ों हजारों अलौकिक रूपों को तू देख।

श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृति वाले अलौकिक रूपों को देख।

The Blessed Lord said: Behold, O Partha Arjuna, My forms, a hundred-fold, a thousand-fold, various in kind, divine, of various colours and shapes.

The stupendous self-revelation of Divine power is manifested to Arjuna who understands the true meaning of the cosmic process and destiny. In M.B. VI, 131, it is said that Krsna appeared in His world-form to Duryodhana, who attempted to him prisoner when He approached Duryodhana for final attempt at reconciliation.

The vision is not a myth or a legend but spiritual experience. In the history of religious experience, we have a number of visions. The transfiguration of Jesus, the vision of Saul on the Damascus Road, Constantine’s vision of the Cross bearing the motto “In this sign, conquer,” John the Arc’s visions are experiences akin to the vision of Arjuna.

Mark IX, 2-8, Saint Hildegard (1098-1180) reports a vision in which she saw a “fair human form” who declared his identity in words reminiscent of the Gita description. “I am that supreme and Fiery force that sends forth all the sparks of life. Death hath no part in me, yet do I allot it, wherefore I am girt about with wisdom as with wings. I am that living and fiery essence of the divine substance that glows in the beauty of the field. I shine in the water.

श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृति वाले अलौकिक रूपों को देख।

हे भरत वंशी अर्जुन! तू मुझमें आदित्यों को अर्थात अदिति के द्वादश पुत्रों को, आठ वसुओं को, एकादश रुद्रों को, दोनों अश्विनी कुमारों को और उनचास मारुत गणों को देख तथा और भी बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ६

पश्य आदित्यान् वसून् रुद्रान् अश्विनौ मरुतः तथा।

बहूनि अदृष्टपूर्वाणि पश्य आश्चर्याणि भारत  ॥६॥

भारत - हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन,

आदित्यान् वसून् रुद्रान् अश्विनौ तथा मरुतः पश्य – बारह आदित्यों को, आठ वसुओं, ग्यारह रुद्रों को और दोनों अश्विनी कुमारों को तथा, उनचास मारुत गणों को देख।

अदृष्ट पुर्वाणि बहूनि आश्र्चर्याणि पश्य – जिनको तूने पहले कभी देखा नहीं ऐसे बहुत से आश्चर्य रूपों को भी तू देख।

हे भरतवंशी अर्जुन! तू मुझमें आदित्यों को अर्थात अदिति के द्वादश पुत्रों को, आठ वसुओं को, एकादश रुद्रों को, दोनों अश्विनी कुमारों को और उनचास मारुत गणों को देख तथा और भी बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख।

Behold, the Adityas, the Vasus, the Rudras, the two Ashvins, and also the Maruts, Behold, O Bharata Arjuna. many wonders never seen before.

डॉ प्रणव पंड्या द्वारा श्लोक ५ और ६ -

श्री भगवान ने कहा कि हे अर्जुन! अब तू मेरे हजारों नाना प्रकार के रूपों के देख। (दिव्यानि रूपाणि पश्य) इनमें १२ आदित्य, ८ वसु, ११ रुद्र, २ अश्विनी कुमार, ४९ मारुत-गण को और कई जिनको किसी ने भी आज तक नहीं देखा, इन सब मेरे रूपों को देख।

मगर अर्जुन को कुछ भी दिखाई नहीं दिया. पर अर्जुन मन से प्रसन्न था कि भगवान ने उसे अपना दिव्य रूप दिखने के लिए उचित पात्र माना है। अर्जुन के पास एक सवाल है कि भगवान के दिव्य रूप को देखे तो कैसे देखे?

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ७

इह एकस्थम् जगत् कृत्स्न्नम् पश्य अद्य सचराचरम्

मम देहे गुडाकेश यत् च अन्यत् द्रष्टुम् इच्छसि ॥७॥

गुडाकेश - हे नींद को जीतने वाले अर्जुन!

मम इह देहे एक-स्थम् चर अचरम् कृत्स्नम् जगत् अद्य पश्य – मेरे इस शरीर के एक देश में चराचर सहित सम्पूर्ण जगत को अभी देख ले।

अन्यत् च यत् द्रष्टुम् इच्छसि – इसके सिवाय तू और भी जो कुछ देखना चाहता है वह भी देख ले।

भावार्थ :  हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचर सहित सम्पूर्ण जगत को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख। (गुडाकेश- निद्रा को जीतने वाला होने से अर्जुन का नाम 'गुडाकेश' हुआ था)

Here today, behold the whole universe, moving and unmoving and whatever else thou desirest to see, O Gudakesa Arjuna., all unified in My body,

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ८

न तु माम् शक्यसे द्रष्टुम् अनेन एव स्वचक्षुषा

दिव्यम् ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगम् ऐश्वरम् ॥८॥

तु अनेन स्व-चक्षुषा माम् द्रष्टुम् एव न शक्यसे – परन्तु तू इसे अपनी आँखों से मुझे देख ही नहीं सकता;

ते दिव्यम् चक्षुः ददामि मे योगम् ऐश्वरम् पश्य – इसलिए तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ जिससे तू मेरा ईश्वरीय सामर्थ्य को देख।

परन्तु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसंदेह समर्थ नहीं है, इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख।

But thou canst not behold Me with this human eye of yours; I will bestow on thee the supernatural eye. Behold My divine power.

I burn in the sun and the moon and the stars. Mine is that mysterious force of the invisible wind. I sustain the breath of all living. I breathe in the verdure and in the flowers, and when the waters flow like living things, it is I. I formed those columns that support the whole earth. All these live because I am in them and am of their life. I am wisdom. Mine is the blast of the thundered word by which all things were made. I permeate all things that they may not die. I am life.” Quoted in Studies in the History and Method of Science, edited by Charles Singer (1917), p. -33.

No fleshly eye can see that sovereign form. Human eye is not made for such excess of light, Divya chaksus is the angelic eye while mamsa chaksus is the eye of the flesh.

Human eyes can see only the outward forms; the inner soul is perceived by the eye of spirit. There is a type of knowledge that we can acquire by our own efforts, knowledge based on the deliverances of the senses and intellectual activity. Another kind of knowledge is possible when we are under the influence of grace, a direct knowledge of spiritual realities. The god-vision is a gift of god. The whole account is a poetic device to indicate the unity of the cosmic manifold in the Divine nature.

The vision is not a mental construction but the disclosure of a truth from beyond the finite mind. The spontaneity and directness of the experience are brought out here.

हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचर सहित सम्पूर्ण जगत को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख।

(गुडाकेश- निद्रा को जीतने वाला होने से अर्जुन का नाम 'गुडाकेश' हुआ था)

परन्तु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसंदेह समर्थ नहीं है, इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख।

डॉ प्रणव पंड्या द्वारा : भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचर सम्पूर्ण जगत को देखो। श्रीकृष्ण अर्जुन को वो सब दिखाना चाहते है जो अर्जुन देखना चाहता है। ऐसे क्षण किसी शिष्य के जीवन में यदा-कदा ही आते है। यह क्षण अर्जुन के लिए बहुत ही विशेष था। अर्जुन ने जगत को एक स्वप्न के रूप में देखा था। अब वह जगत को स्वप्न से बाहर निकल कर देखने की कोशिश की है। वह अब श्रीकृष्ण में ही लीन हो गया है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते है –- दिव्यम ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमेश्वर्यम. - मैं तुझे दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख। बिना दिव्य अलौकिक नेत्रों के ईश्वर का स्वरूप देखा जाना संभव नहीं है। हे अर्जुन!, तुम अपनी इन सांसारिक आँखों से मेरे दिव्य स्वरूप को देखने में सक्षम नहीं हो। इसलिए मैं तुम्हें दिव्य चक्षु देता हूँ जिससे तुम मेरी योग शक्ति की मदद से मेरा ऐश्वर्य शाली स्वरूप देख पाओगे।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ९

(संजय द्वारा धृतराष्ट्र के प्रति विश्वरूप का वर्णन)

संजय को भी वेदव्यास जी से दिव्य दृष्टि मिली हुई थी, इसलिए अर्जुन के साथ – साथ उन्होंने भी भगवान के विश्व रूप के दर्शन किये थे।

गीता अध्याय १८ श्लोक ७५ –

व्यास प्रसादात् श्रुतवान् एतत् गुह्यम् अहम् परम्।

योगम् योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कथयतः स्वयम् ॥७५॥

श्री व्यास जी की कृपा से दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग को अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं साक्षात योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना।

डॉ प्रणव पंड्या द्वारा गीता अध्याय ११ के श्लोक ९ से १२ की व्याख्या :

संजय उवाच

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ९

एवम्, उक्त्वा, ततः, राजन्, महायोगेश्वरः, हरिः ।

दर्शयामास, पार्थाय, परमम्, रूपम्, ऐश्वरम् ॥९॥

सञ्जयःउवाच – संजय ने कहा

राजन् – हे राजन (धृतराष्ट्र)!

एवम् उक्त्वा ततः महायोगेश्वरः हरिः – ऐसा कहकर फिर महा योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने,

पार्थाय परमम् ऐश्वरम् रूपम् दर्शयामास - अर्जुन को परम ऐश्वर्य विराट रूप दिखाया।

संजय बोले- हे राजन‌! (धृतराष्ट्र)

महा-योगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात अर्जुन को परम ऐश्वर्य-युक्त दिव्य स्वरूप दिखलाया।

Sanjay said: Having thus spoken, O King, Hari, the great lord of yoga, then revealed to Partha Arjuna., His Supreme and Divine Form.

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक १०-११

अनेक वक्त्र नयनम् अनेक अद्भुत दर्शनम्‌ ।

अनेक दिव्य आभरणम् दिव्य अनेक उद्यत आयुधम्‌ ॥१०॥

दिव्य माल्य अम्बरधरम् दिव्य गन्ध अनुलेपनम्‌ ।

सर्व: आश्चर्य मयम् देवम अनन्तम् विश्वत: मुखम्‌ ॥११॥

अनेक वक्त्र नयनम् – जिनके अनेक मुख और नेत्र हैं,

अनेक अद्भुत दर्शनम्‌ - अनेक तरह के अद्भुत दर्शन हैं,

अनेक दिव्य आभरणम् – अनेक अलौकिक आभूषण हैं,

दिव्य अनेक उद्यत आयुधम्‌ - हाथों में उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं,

दिव्य माल्य अम्बर धरम् – तथा जिनके गले में दिव्य मालाएं हैं, जो अलौकिक वस्त्र पहने हुए हैं,

दिव्य गन्ध अनुलेपनम्‌ - जिनके ललाट तथा शरीर पर दिव्य चंदन, कुमकुम आदि लगा हुआ है,

सर्व आश्चर्य मयम् अन-अन्तम् – ऐसे सम्पूर्ण आश्चर्य मय अनन्त रूपों वाले

विश्वत: मुखम्‌ देवम - तथा सब तरफ मुखों वाले देव ( अपने दिव्य स्वरूप को भगवान ने दिखाया।

विराट रूप से प्रकट हुए भगवान श्रीकृष्ण के अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनों वाले, बहुत से दिव्य आभूषणों से युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रों को धारण किए हुए और दिव्य गंध का सारे शरीर में लेप किए हुए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमारहित और सब ओर मुख किए हुए विराट स्वरूप परम देव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा।

Of many mouths and eyes, of many visions of marvel, of many divine ornaments, of many divine uplifted weapons. Wearing divine garlands and raiment, with divine perfumes and ointments, made up of all wonders, resplendent, boundless, with face turned everywhere.

गीता अध्याय ११ श्लोक ९ – संजय राजा धृतराष्ट्र को संबोधित करते हुए बोले- हे राजन! महा-योगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात अर्जुन को परम ऐश्वर्य-युक्त दिव्य स्वरूप दिखलाया।

डॉ प्रणव पंड्या द्वारा गीता अध्याय ११ का श्लोक १० की व्याख्या:  भगवान श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप में अनेकों-अनेक मुख, अनेकों आँखें वे सब दिव्य हैं। उनके मुख, नेत्र, हाथ पैर आदी सब-के-सब अंग विराट रूप भगवान के हैं। अनेक दिव्य आभूषण, अनेकों अनेक दिव्य शस्त्रों जैसे गदा, चक्र, धनुष, बाण, परिध आदि को धारण किये हुए भगवान श्रीकृष्ण का यह रूप अर्जुन की कल्पना से परे था। भगवान श्रीकृष्ण अपने विराट रूप में गले में फूलों की, सोने-चांदी, मोतियों, दिव्य दुर्लभ रत्नों की माला धारण किये हुए हैं। उन्होंने अपने अनेकों-अनेक शरीरों पर लाल, पीले, हरे, सफेद, कपिश आदि अनेक रंगों के वस्त्र पहन रखे हैं, जो सभी दिव्य हैं।

विराट रूप भगवान ने ललाट पर कस्तूरी, चन्दन, कुमकुम आदि गंध के जितने तिलक किये है तथा शरीर पर जितने लेप किये हैं, वे सब-के-सब दिव्य हैं।

इस प्रकार देखते ही चकित कर देने वाले, अनन्त रूप वाले तथा चारों तरफ मुख-ही-मुख वाले अपने परम ऐश्वर्य मय रूप को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिखाया।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग के श्लोक १२

दिवि सूर्य सहस्त्रास्य भवेत् युगपत् उत्थिता।

यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासः तस्य महात्मनः ॥१२॥

दिवि युगपत् सूर्य सहस्त्रस्य उत्थिता भवेत्  - अगर आकाश में एकसाथ हजारों सूर्यों का उदय हो जाय, (तो भी)

सा भाः तस्य महात्मनः भासः सदृशी यदि स्यात् – उन सब का प्रकाश मिलकर भी उस महात्मा याने श्रीकृष्ण के विराट रूप परमात्मा के प्रकाश के सामान शायद ही अर्थात नहीं हो सकता।

आकाश में हजारों सूर्य के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्व रूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित्‌ ही हो।

If the light of a thousand suns were to blaze forth all at once in the sky, that might resemble the splendour of that exalted Being.

डॉ प्रणव पंड्या द्वारा गीता अध्याय ११ श्लोक १२ की व्याख्या

हजारों सूर्य अगर एकसाथ उदित याने प्रकाशित हों तो भी उनका प्रकाश भगवान के शरीर से निकलने वाले प्रकाश के सामने कुछ भी नहीं था। (भाः – प्रकाश) अर्जुन का पहला अनुभव दिव्य दृष्टि पाने के बाद भगवान का ऐश्वर्य देखने का था. विश्वरूप, दिव्य, सुन्दर और श्रेष्ठ स्वरूप था।

अब अर्जुन परमात्मा का निरंतर शाश्वत तेज स्वरूप देख रहा है। पहले उगता सूर्य का स्वरूप था, अब पूर्ण तेजस्वी सूर्य का रूप।

इसी प्रकार गीता हमें भगवान को धीरे - धीरे जानना सिखाती है। हमारी ध्यान अवस्था में हमें पहले भगवान के आभा मंडल का ध्यान करना चाहिए फिर स्वयं भगवान का।

यह महा सूर्य, अनंत सूर्य का प्रकाश कभी भी हमें दिख सकता है। परमात्मा की परम अनुभूति ही दिव्य प्रकाश है। ये वो नूर, वो प्रकाश, जिसे ईसा या मूसा ने देखा होगा। अर्जुन के लिए तो पूरा आकाश ही दिव्य ज्योति से भर गया। यह एक दिव्य अनुभूति थी।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक १३

तत्रा एकस्थम् जगत् कृत्स्न्नम् प्रविभक्तम् अनेकधा।

अपश्यत् देवदेवस्य शरीरे पाण्डवः तदा ॥१३॥

तदा पाण्डवः देव-देवस्य तत्र शरीरे एक-स्थम् – उस समय अर्जुन ने देवों के देव भगवान के उस शरीर में एक जगह स्थित;

अनेकधा प्रविभक्तम् कृत्स्नम् जगत् अपश्यत् – अनेक प्रकार के विभागों में विभक्त सम्पूर्ण जगत को देखा।

पाण्डु-पुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात पृथक-पृथक सम्पूर्ण जगत को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा।

There the Pandava Arjuna. Beheld the whole universe, with its manifold divisions gathered in one, in the body of the God of gods.

Arjuna had the vision of the One in the many and the many in the One. All things remain the same yet all are changed. There is astonishment at the disappearance of the familiar land marks of the everyday world. Everything is interfused, each with each and mirrors the whole. The vision is a revelation of the potential divinity of all earthly life.

गीता अध्याय ११ श्लोक १३ की डॉ प्रणव पण्ड्या द्वारा व्याख्या:

संजय का धृतराष्ट्र को भगवान श्रीकृष्ण के विश्वरूप का वर्णन – हे राजन,  पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात पृथक-पृथक सम्पूर्ण जगत को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा। भगवान श्रीकृष्ण ने अपना अत्यंत तेजस्वी स्वरूप अर्जुन को दिखाया. श्रीकृष्ण न सिर्फ दर्शन ही दिखा रहे हैं, वे अर्जुन को अपने स्वरूप का अनुभव भी करते जा रहे हैं। यहाँ अर्जुन भगवान को अब अद्वैत रूप में देख रहा है। इस जगत का मूलभूत सूक्ष्म स्वरूप और वृहत ब्रह्माण्ड का स्वरूप एक ही है। भगवान कहते है कि सोना, सोना है, पत्थर, पत्थर है, गाय, गाय है। पर वास्तव में इन सब का मूलभूत सूक्ष्म शरीर एक ही है। दिखने में सब अलग - अलग लगते हैं, वास्तव में सब एक ही परम ऊर्जा जो अर्जुन ने अभी देखी उस ऊर्जा के कण मात्र हैं। इस दिव्य प्रकाश को देखने के बाद भगवान का अद्वैत रूप देखना संभव हो पाता है।

अर्जुन ब्रह्माण्ड के पृथक-पृथक हिस्सों को एकसाथ एक जगह श्रीकृष्ण के शरीर में देखता है।

विवेकानन्द अपने गुरु राम-कृष्ण परमहंस से समझने का प्रयत्न कर रहे हैं कि लोटा में ब्रह्म है, थाली में ब्रह्म है। यह कैसे संभव है। गुरु जी अपनी एक उंगली से विवेकानन्द को छूते है, और विवेकानन्द का जीवन ही बदल जाता है। विवेकानन्द को सब जगह प्रकाश ही प्रकाश दिखाई देने लगता है। वो स्वयं, उनके गुरु, थाली, लोटा, उपस्थित सब वस्तुएं एक ही तरह के प्रकाश से प्रकाशित हो जाती है। मैं और तुम का अंतर समाप्त हो जाता है. यह दिव्य अनुभव था. विवेकानन्द कई दिनों तक इसी अवस्था में रहे। एक सच्चा गुरु ही अपने शिष्य को यह अनुभव करवा सकता है। यही अनुभव श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को करवा रहे हैं।

समस्त खंड- खंड में बटी चीजों को अर्जुन ने परमात्मा में एक ही जगह एक रूप में स्थित देखा। एक अखंड सीमा रहित प्रकाश, दिव्य उजाले का महासागर।

गीता अध्याय ११ विश्व रूप दर्शन योग श्लोक १४

ततः सः विस्मयाविष्टः हृष्टरोमा धनंजयः ।

प्रणम्य शिरसा देवम् कृत अञ्जलिः अभाषत  ॥१४॥

ततः सः धनञ्जयः विस्मय-आविष्टः हृष्ट-रोमा – इसके बाद भगवान के विश्व-रूप को देख कर वे अर्जुन बहुत चकित हुआ और आश्चर्य के कारण उनका शरीर रोमांचित हो गया।

कृत अञ्जलिः देवम् शिरसा प्रणम्य अभाषत – वे हाथ जोड़कर विश्वरूप को नत-मस्तक हो कर वे भगवान को प्रणाम करके बोले -  

तब मोहग्रस्त एवं आश्चर्यचकित रोमांचित हुए अर्जुन ने प्रणाम करने के लिए मस्तक झुकाया और वह हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करने लगा।

Then he, the Winner of wealth Arjuna, stuck with amazement, his hair standing on end, bowed down his head to the Lord, with hands folded in salutation, said:

In an agony of awe, his hair uplift, his head on high, his hand clasped in supplication, Arjuna adores.

हृष्ट-रोमा: – हर्ष से रोमांचित। आश्चर्यचकित और पूर्ण रूप से सम्मोहित अर्जुन अन्दर से पुलकित।

कृत अञ्जलिः – हाथ जोड़ कर

शिरसा प्रणम्य – नत-मस्तक हो कर प्रणाम करते हुए

देवम् अभाषत – भगवान् को कहने लगा। अब अर्जुन की तर्क शक्ति सब ख़त्म हो गयी। विराट के उद्घाटन  होते ही बुद्धि के तंतु टूट गए। अर्जुन अब बुद्धि से परे हो गया। उसका रोम - रोम उसका रोमांचित है।

एक कहानी है – संत नाभादास और संत तुलसीदास जी वृंदावन में यमुना तट पर पास - पास की दो झोंपड़ियों में रहते थे। रात के वक्त नाभादास जी पास की कुटिया से राम राम का जप सुनते थे। तो नाभादास जी पास वाली कुटिया में गोस्वामी जी से मिलने गए। वहां देखा तो तुलसी दासजी तो गहरी निंद्रा में सो रहे हैं पर उनके पूरे शरीर से राम धुन निकल रही है। नाभादास जी ने तुलसी दासजी को जगाया स्वयं के वहाँ आने का कारण बताया. तुलसी दासजी ने बताया की यह तो प्रभु राम का प्रताप है कि उनका रोम - रोम राम रम गए है। यही स्थिति अब अर्जुन की है. अर्जुन पूर्ण रूप से, पूरी श्रद्धा से भगवान श्रीकृष्ण के सामने झुक गए है।

श्रीमद भागवत में एक प्रसंग है जिसमें माता यशोदा छड़ी ले कर बाल कृष्ण को धमकाती है – तूने माटी क्यों खाई? तब बाल कृष्ण अपना मुख खोल कर कहते हैं, मैं ने माटी नहीं खाई। उस समय बल कृष्ण के खुले हुए मुख में मैया यशोदा ने सारा ब्रह्माण्ड देखा, पूरा भूमंडल देखा, भारतवर्ष देखा, उसमें मथुरा खंड देखा, मथुरा में नन्द गाँव देखा और उस नन्द गाँव में मैया ने अपने आप को भी देखा – “सहात्मानम्” (श्रीमद भगवतम् १० स्कंध, अध्याय ८, ३९ श्लोक। इसी प्रकार भगवान ने अपने शरीर के किसी अंश में अर्जुन को सम्पूर्ण जगत को देखा दिया।

गीता के इस अध्याय में श्रीकृष्ण के विराट विश्व रूप को जिस प्रकार अर्जुन ने देखा वैसा श्लोक १५ से ३१ तक में वर्णन किया है।

गीता अध्याय ११ विश्व रूप दर्शन योग श्लोक १५

अर्जुन उवाच

पश्यामि देवान् तव देव देहे सर्वान् तथा भूतविशेषसंघान् ब्रह्माणम् ।

ईशम् कमलासनस्थम् ऋषीन् सर्वान् उरगान् दिव्यान्  ॥१५॥

अर्जुनः उवाच – अर्जुन ने कहा

देव- हे प्रभु श्रीकृष्ण !

तव देहे सर्वान् देवान् तथा भूत-विशेष-सङघान् – आपके शरीर में सम्पूर्ण देवताओं को तथा प्राणियों के विशेष – विशेष समुदायों को:

च कमल-आसन-स्थम् ब्रह्माणम् ईशम् सर्वान् ऋषीन् च दिव्यान् उरगान् – और कमल-फूल पर बैठे हुए ब्रह्मा जी को. ईशम् याने शिव शंकर जी को, सम्पूर्ण ऋषियों को और दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ।

अर्जुन बोले- हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ।

In Thy body, O God, I see all the gods and the varied hosts of beings as well, Brahma, the lord seated on the lotus throne and all the sages and heavenly nagas.

The vision of God widens our horizon and takes us beyond the earthly tumults and sorrows which so easily obsess us. God’s creation is not limited to this small planet, which is only an insignificant part of the cosmos. Arjuna sees the great and various company of spirits filling the universe.

डॉ प्रणव पंड्या द्वारा गीता अध्याय ११ श्लोक १५ की व्याख्या: भगवान के विराट रूप के दर्शन से अर्जुन के मन में परम श्रद्धा और विश्वास जगा। गुरु जब शिष्य को दिव्य अनुभूति देता है तो शिष्य अपना शीश पूर्ण श्रद्धा से गुरु के चरण-कमलों में रख देता है। इस परम अनुभूति और चेतना की स्थिति में, अर्जुन भगवान श्री कृष्ण को संबोधित करता है कि हे देव, मैं आपके विराट शरीर से समस्त देवी-देवताओं को, सारे प्राणियों को, कमल के फूल पर आसीन ब्रह्मा याने शेषनाग पर लेटे हुए भगवान विष्णु की नाभि से निकली कमल की नाल पर बैठे हुए ब्रह्मा जी को देखता हूँ, और ईशम् – याने शिव जी कैलाश पर्वत पर तपस्या करते हुए महादेव जी देख रहा हूँ, पृथ्वी पर रहने वाले जितने भी ऋषि हैं, और पाताल लोक में रहने वाले अनेकों अनेक दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ। एक तरफ श्रष्टि के रचयिता ब्रह्माजी और दूसरी और श्रष्टि के संहारक महादेव जी, दोनों को एक साथ आपके शरीर में देख रहा हूँ। हे श्रीकृष्ण! सृजन  भी आपके अन्दर है और अंतिम छोर भी आपमें है। याने स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल सब एक ही जगह देख रहा हूँ।

गीता अध्याय ११ के ७ श्लोक में भगवन स्वयं कह रहे थे – इह एकस्थं ..... मम देहे (११.७) तब् अर्जुन ने “तत्र एकस्थं ..... देवदेवस्य शरीरे” सम्पूर्ण जगत को एक स्थान पर देख कर कहते हैं – तव देव देहे।  

सभी ऋषि ओर महा-ऋषियों और दिव्य दर्पण भी आपके विराट रूप में मौजूद हैं। महर्षियों का अर्थ है कि समस्त ज्ञान भी परमात्मा से ही उत्पन्न होता है। विज्ञान और आध्यात्मिकता का उद्गम परमात्मा से ही होता है। अनंत, वासुकि, महा-संख्य आदि दिव्य सर्पों भी आपके शरीर में है। सारी ऊर्जा धराएँ जो जगत में हैं, वे सब दिव्य सर्पों के रूप में परमात्मा के शरीर में मौजूद हैं। परमात्मा ज्ञान के भी और ऊर्जा के भी उद्गम सोत्र हैं।

गीता अध्याय ११ विश्व रूप दर्शन योग श्लोक १६

अनेक बाहु उदर वक्त्र नेत्रम् पश्यामि त्वाम् सर्वतः अनन्तरूपम् अन्तम्

मध्यम् पुनः तव आदिम् पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप  ॥१६॥

विश्वरूप – हे विश्वरूप!

विश्व-ईश्वर  – हे ब्रह्माण्ड के स्वामी!

त्वाम् अनेक बाहु उदार वक्त्र नेत्रम् सर्वतः अनन्त-रूपम् पश्यामि – आपको मैं अनेक हाथों, पेटों, मुखों और नेत्रों तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देख रहा हूँ। 

तव न आदिम् न मध्यम् पुनः न अन्तम् पश्यामि – मैं आपके न आदि को, न मध्य को और न अन्त को ही देख रहा हूँ।

हे सम्पूर्ण विश्व के स्वामी! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ, न मध्य को और न आदि को ही।

I behold Thee, infinite in form on all sides, with numberless arms, bellies, faces and eyes, but I see not Thy end or Thy middle or Thy beginning, O Lord of the universe, O Form Universal.

डॉ प्रणव पंड्या द्वारा गीता अध्याय ११ श्लोक १६ की व्याख्या: अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप को देख कर प्रार्थना करते हुए कहा, ‘ओ मेरे स्वामी, आप इस सारे ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं, आप विश्वेश्वर हैं, मैं आप में अनगिनत हाथों, उदर, चेहरे, आँखें देख रहा हूँ.’ (अनेक बाहूँ उदर वक्त्र नेत्रं पश्यामि) और आप को अनंत रूपों वाला देखता हूँ। मैं आप का आदि, मध्य, या अंत स्वरूप नहीं देख पा रहा हूँ।

अर्जुन भगवान का यह स्वरूप देख कर पूर्ण रूप से सम्मोहित और श्रद्धा से भर गया था। अर्जुन की यह स्थिति समझ में आ सकती है, क्योंकि उसे हजारों-हज़ार धरतीयों के लोगों के हाथ, पेट, मुख, दिख रहे थे – वो बोले भी तो क्या बोले? इतना विशाल ब्रह्माण्ड स्वरूप है भगवान श्रीकृष्ण का। समस्त श्रष्टि का जोड़ है परमात्मा का स्वरूप। अगर हम इतनी अंतहीन नक्षत्रों और उनकी पृथ्वी की कल्पना भी करे तो भी वो हमारी कल्पना शक्ति के बाहर है। अर्जुन निश्चय ही भाग्यशाली जिसने यह दृश्य देखा। वह भगवान से पूँछ रहा है कि यह कैसा स्वरूप हे प्रभु जिसका न आदि है, न मध्य, और न ही जिसका अंत दिखाई देता है।

एक कहानी है. जैन संत बोकजू को एक रात एक बुद्ध मंदिर में रुकना पड़ा। मंदिर में भगवान् बुद्ध की सैकड़ों लकड़ी की मूर्तियाँ थी। मंदिर में बहुत ही ठण्ड थी। ठण्ड से बचने के लिए संत बोकजू ने बुद्ध की एक मूर्ति को उठा कर उसमें आग लगा दी और उस आग से तापने लगे। मंदिर के पुजारी ने जब मंदिर से आग निकलते  देखी, तो वो बहुत नाराज हुआ और बुद्ध की मूर्ति में आग लगाने का कारण पूछने लगा। पुजारी ने कहा, ‘संत बोकजू आप बुद्ध को आग लगा रहे हैं?

संत बोकजू वहाँ पड़ी राख में कुछ ठूंठ ने लगे। पुजारी ने फिर पूछा कि, ‘संत बोकजू आप क्या कर रहे है?’

संत बोकजू बोले, ‘भाई में बुद्ध की अस्थियाँ ठूंठ रहा हूँ।’

पुजारी ने संत को मंदिर से बाहर निकाल दिया।

अगले दिन सुबह पुजारी ने देखा कि संत बोकजू एक पत्थर की पूजा कर रहे हैं। पुजारी से रहा नहीं गया। उसने फिर संत से पूछा कि एक पत्थर की मूर्ति की पूजा क्यों? बोकजु ने कहा, ‘यदि आपको भगवान की पूजा करनी है, तो मूर्ति पत्थर की हो की लकड़ी की, क्या फर्क है? ईश्वर तो सब में है। उसका न आदि है, न मध्य, और नहीं अंत. मंदिर में तो मनुष्य अपने अहंकार की ही पूजा करता है। और पुजारी तुम वही कर रहे हो। मूर्ति हो, पत्थर हो, कंक्कड़ हो, हर जगह उस परमात्मा की पूर्णता है. यदि हम इस तथ्य को समझ जाएँ की परमात्मा सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, और सर्वज्ञ है, तो फिर परमात्मा से संवाद संभव है।

गीता अध्याय ११ विश्व रूप दर्शन योग श्लोक १७

किरीटिनम् गदिनम् चक्रिणम् तेजोराशिम् सर्वतः दीप्तिमन्तम्

पश्यामि त्वाम् दुर्निरीक्ष्यम् समन्तात् दीप्तानलार्कद्युतिम् अप्रमेयम्  ॥१७॥

त्वाम् किरीटिनम् गदिनम् चक्रिणम् पश्यामि – मैं आपको किरीट याने मुकुट, गदा, चक्र तथा शंख और पद्म धारण किये हुए देख रहा हूँ। (विष्णु का चतुर्भुज रूप)

तेजःराशिम् सर्वतः दीप्ति-मन्तम् दीप्त-अनल अर्क द्युतिम् – आपको तेज की राशि या समूह, सब ओर प्रकाश वाले देदीप्यमान अग्नि तथा सूर्य के समान कांति वाले,

दुर्निरीक्ष्यम् च समन्तात् अप्रमेयम् – नेत्रों के द्वारा कठिनता से देखे जाने योग्य और सब तरफ से अप्रमेय स्वरूप देख रहा हूँ। आँखें चका-चौंध होने से कुछ देख पाना कठिन हो गया है। (दिव्य-दृष्टि के बावजूद भी भगवान के तेज इतना प्रकाशमय था कि अर्जुन की आँखें भी नहीं देख पा रही थी)

आपको मैं मुकुट-युक्त, गदा-युक्त और चक्र-युक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योति-युक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेय-स्वरूप देखता हूँ।

I behold Thee with Thu crown, mace, and discus, glowing everywhere as a mass of light, hard to discern, (dazzling) on all sides with the radiance of the flaming fire and sun, incomparable.

गीता अध्याय ११ श्लोक १७ पर डॉ. प्रणव पंड्या द्वारा व्याख्या:

अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण का मुकुटधारी स्वरूप देख रहा है। मुकुट भगवान का ब्रह्माण्ड पर अधिकार का प्रतीक है। उनका संसार पर आधिपत्य है। वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी है। भगवान् के एक हाथ में कौमुद नामक गदा जो सारी बुराइयों का नाश का प्रतीक है। गदा की उपस्थिति ही सारी अनैतिक कृत्यों के नाश के लिए काफी है।

भगवान श्रीकृष्ण के एक हाथ में सुदर्शन चक्र है। यह सुदर्शन चक्र शुभ दर्शन का प्रतीक है। यह अहंकार का नाश करने वाला है। अहंकार की प्रभु की दुनिया में कोई जगह नहीं है। शिशुपाल ने भगवान् श्रीकृष्ण को १०० बार अपमानित किया पर श्रीकृष्ण ने उसे हर बार चेतावनी दे कर माफ कर दिया। अंत में जब शिशुपाल जब भगवान की चेतावनी को अनसुना करा तो श्रीकृष्ण ने इसी सुदर्शन चक्र से उसका सर धड़ से अलग कर दिया। शिशुपाल के अहंकार को नष्ट कर दिया।

भगवान के चारों ओर जो आभा अर्जुन ने देखी उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। अग्नि और सूर्य की आभा भी भगवान की आभा के सामने कुछ नहीं है। अर्जुन श्रीकृष्ण की आभा में अग्नि का तेज और सूर्य की आभा का समावेश देख रहा है। दोनों ही भगवान के अंश ही है। अर्जुन भगवान से कह रहा है कि हे प्रभु आप का यह कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेय स्वरूप (अपरिमित) को मैं देखता हूँ। मेरे पास कोई शब्द नहीं है, और न ही मुझ में इतनी बुद्धि है कि आपके इस रूप का बखान कर सकूँ।

सूफी संतो में कहावत है कि अपना रहस्य भरा परमात्मा से जुड़ा अनुभव जनता को मत समझाओ। जन साधारण आपके अनुभव को नहीं समझ सकती। और आपको पागल या कुर्फ कह कर आपका कत्ल कर देगी। सूफी संत मंसूर अल हल्लाज ने जब अपनी आध्यात्मिक परमानन्द की स्थिति में अनाल हक (Unal Haq (Arabic: أنا الحق) – मैं ही सत्य हूँ - कहा तो उसे कुर्फ करार कर दिया और फँसी पर लटका दिया. अनाल हक याने मैं ही सत्य हूँ, या मैंने जीवन का सच समझ लिया है.

Mansoor Al-Hallaj was condemned to hang by the neck for shouting in ecstasy Anal-Haq, Anal-Haq (I am the Truth, I am the Truth). The orthodox understood this to mean that he was claiming to be God himself, whereas he had proclaimed in his sublime spiritual ecstasy, simply a total annihilation of himself.

अर्जुन अब भगवान के असली अप्रमेय स्वरूप मतलब जिसका बखान शब्दों से नहीं किया जा सकता ऐसे स्वरूप को समझ गया था। अर्जुन परमात्मा के इस रूप को देख कर पूर्ण रूप से सम्मोहित हो गया था। इस तेजस्वी रूप का वर्णन उसकी बुद्धि और क्षमता के परे था।

गीता अध्याय ११ विश्व रूप दर्शन योग श्लोक १८

त्वम् अक्षरम् परमम् वेदितव्यम् त्वम् अस्य विश्वस्य परम् निधानम् त्वम्

अव्ययः शाश्वतधर्म गोप्ता सनातनः त्वम् पुरुषः मतः मे ॥१८॥

त्वम् वेदितव्यम् परमम् अक्षरम् – आप ही जानने योग्य परम अक्षर ( प्रणव – ब्रह्म ) हैं,

त्वम् अस्य विश्वस्य परम् निधानम् – आप ही इस सम्पूर्ण विश्व के परम आश्रय हैं,

त्वम् शाश्वत धर्म गोप्ता – आप ही सनातन धर्म के रक्षक हैं, (गीता अध्याय ४ श्लोक ७: यदा यदा हि धर्मस्य .... तदात्मानं सृजाम्यहम्‌)

त्वम् अव्ययः सनातनः पुरुषः मे मतः – और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं ऐसा मैं मानता हूँ।

आप ही जानने योग्य परम अक्षर अर्थात परब्रह्म परमात्मा हैं। आप ही इस जगत के परम आश्रय हैं, आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं। ऐसा मेरा मत है।

Thou art the Imperishable, the Supreme to be realized. Thou art the ultimate resting – place of the universe; Thou art the undying guardian of the eternal law. Thou art the Primal Person, I think.

अक्षरम् – imperishable, Arjuna states that the Supreme is both Brahman, and Ishvara, Absolute and God.

शाश्वत धर्म गोप्ता – the undying guardian of the eternal law, Abhinavagupta reads शाश्वत धर्म गोप्ता, the guardian of the sattvata dharma.

गीता अध्याय ११ श्लोक १८ की डॉ प्रणव पंड्या द्वारा व्याख्या:

अब अर्जुन भगवान से कहते है, हे श्रीकृष्ण १. आप अविनाशी अक्षरम् (अक्षर) परब्रह्म परमात्मा हैं, २. आप वेदितव्यम् – आप समस्त जानने योग्य ज्ञान हैं, ३. आप इस संसार के परम आश्रय दाता – निधानम्,  ४. आप अनादी शाश्वत धर्म के रक्षक - शाश्र्वत-धर्म-गोप्ता, भी आप ही हैं, ५. और आप ही सनातन परम पुरुष हैं - सनातनस्त्वं पुरुषो।

अर्जुन के मुख से दिव्य दृष्टि के भगवान का सच्चा स्वयं अनुभव किया हुआ तथ्य बोला जा रहा है। ऐसा सत्य सिर्फ अर्जुन जैसे परम भक्त के मुख से निकल सकता है। आराध्य रूपी सद्गुरु का दिव्य दर्शन बड़ी दुर्लभता से होता है. दिव्य दृष्टि ही अपने आप में एक अनोखी विभूति है। यह सब को नहीं मिल सकती. अर्जुन कह रहे है कि हे प्रभो आप ही परम-अक्षर, पर-ब्रह्म, अविनाशी सनातन परम-पुरुष है ऐसा मेरा मत है – मतो मे। मैं सच भी हो सकता हूँ और गलत भी। मगर जो मैं आप को देख समझ पाया हूँ उस हिसाब से तो आप ही परमात्मा हैं. इस में बहुत विनम्र भाव से, अहंकार से रहित, बिना किसी भ्रम के अर्जुन ने जो देखा वो उसने वर्णित कर दिया।

उपनिषद कहते है : - यस्मिन विजनीते सर्वत्र विजनीति अथार्थ जिसे जान लेने के पर सब कुछ जान लिया जाता है, वही जानने योग्य है – बस परमात्मा ऐसे ही है। जब जानने की दौड़ समाप्त हो गयी। जिज्ञासा का उपद्रव समाप्त हो गया। सीमाहीन, सर्वव्यापी, सबके परम आश्रय, सबके आदि रक्षक ये ही भगवान हैं। नियमों के कारण धरती टिकी हुई है, इन नियमों के रक्षक भगवान ही हैं। यह एक शिष्य के रूप में अर्जुन का अनुभव है।

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि देते हुए कहा कि:

ते दिव्यम् चक्षुः ददामि मे योगम् ऐश्वरम् पश्य – इसलिए तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ जिससे तू मेरा ईश्वरीय सामर्थ्य को देख। हे अर्जुन अब तू मेरे विराट रूप को देख - दिव्यानि रूपाणि पश्य।

अर्जुन जो श्रीकृष्ण का रूप देख रहा है वही वह यहाँ वर्णित कर रहा है। अर्जुन कहता है ‘हे कृष्ण, हे भगवान – मैं इस दिव्य दृष्टि से तुम्हारे अनन्त रूप को देख रहा हूँ -

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक १९

अनादि मध्यन्तम् अनन्त वीर्यम् अनन्त बाहुम् शशि-सूर्य नेत्राम्

पश्यामि त्वाम् दीप्त हुताश वक्त्राम् स्वतेजसा विश्वम् इदम् तपन्तम् ॥१९॥

त्वाम् अनादि मध्यन्तम्, अनन्त वीर्यम्, अनन्त बाहुम् आपको मैं आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओं वाले,

शशि-सूर्य नेत्राम्, दीप्त हुताश वक्त्राम् – चन्द् और सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित  अग्नि रूप मुखों वाले और,

स्वतेजसा इदम् विश्वम् तपन्तम् पश्यामि – अपने तेज से इस संसार को तापते हुए देख रहा हूँ।

आपको आदि, अंत और मध्य से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त भुजा वाले, चन्द्र-सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुख वाले और अपने तेज से इस जगत को संतृप्त करते हुए देखता हूँ

तीन तरह के अनन्त रूप का वर्णन है। देश-कृत, काल-कृत, और वस्तु-कृत याने परमात्मा स्थान, समय और वस्तु सबसे परे अनन्त हैं। उन्हें किसी भी तरह से मापा-नापा नहीं जा सकता।

अनन्त वीर्यम् – अपार पराक्रम, सामर्थ्य, बल और तेज – असीम अनन्त शक्ति।

दीप्त हुताश वक्त्राम् – यज्ञ, होम आदि में जो कुछ अग्नि में हवन किया जाता है, उन सबको ग्रहण करने वाले दैदीप्यमान अग्नि रूप मुख आप ही हैं।

I behold Thee as one without beginning, middle or end, of infinite power, of numberless arms, with the moon and the sun as Thine eyes, with Thy face as a flaming fire, whose radiance burns up this universe.

अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से कह रहे हैं कि हे प्रभो! मैं आप को एक ऐसे रूप में देख रहा हूँ जिसका न आदि है, न मध्य और न ही जिसका अंत दिखाई देता है आप में असीम बल है, अनंत बाहें हैं, चाँद और सूर्य जैसी आपकी आँखें हैं, अत्यंत तेज आप के चेहरे से निकल रहा है, जिसमें सारा ब्रह्माण्ड तप सा रहा है अर्जुन अपनी दिव्य आँखों से श्रीकृष्ण का विश्व स्वरूप देख रहा है उस स्वरूप में वह अपना भी अस्तित्व देख रहा है

हम सब उस अनन्त वीर्यम् – असीम बलवान और महिमामय परमात्मा के सामने अत्यंत सूक्ष्म हैं सूर्य और चन्द्र जिसकी आँखें हैं, जिनके प्रकाश से दिन-रात उजाला बना रहता है

परमात्मा दीप्त हुताश-वक्त्रम् – (ज्वालामुखी – जो निरंतर आग उगल रहा हो) निरंतर प्रज्वलित अग्नि को आपके मुख से निकलती देखता हूँ अग्नि सभी देवताओं का मुख है अग्नि मुख वाले प्रभु यज्ञ-पुरुष हैं जब हम यज्ञ में आहुति देते है तो वो हम अग्नि देवता के मुख को देते है सारा पर्यावरण इस आहुति से पनपता है अब अर्जुन भगवान श्री कृष्ण को कहता है कि हे प्रभो सारा ब्रह्माण्ड आपके इस अग्नि-मय ताप को महसूस करता है

विश्र्वम् इदम् तपन्तम् – विश्व को इस तपाते हुए – सारे संसार की ऊर्जा का उद्गम याने यह ऊष्मा याने ताप आप ही है

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक २० –

द्यावापृथिव्योः इदम् अन्तरम् हि व्याप्तम् त्वया एकेन दिशः सर्वाः

दृष्टवा अद्भुतम् रूपम् उग्रम् तव इदम् लोकत्रायम् प्रव्यथितम् महात्मन् ॥२०॥

महात्मन् – हे महात्मन्!

इदम् द्यावापृथिव्योः अन्तरम् च सर्वाः दिशः एकेन त्वया हि व्याप्तम् – यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का अन्तराल और सम्पूर्ण दिशाएं एक आपसे ही परिपूर्ण हैं।

तव इदम् अद्भुतम् उग्रम् दृष्टवा लोकत्रायम् प्रव्यथितम् – आपके इस अद्भुत और उग्र रूप को देखकर तीनों लोक व्यथित याने व्याकुल हो रहे हैं।

हे महात्मन्‌! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अति-व्यथा को प्राप्त हो रहे हैं

त्वया एकेन – असंख्य रूपों में एक आप ही हो।

लोकत्रायम् प्रव्यथितम् – विश्र्वम् इदम् तपन्तम् - अर्जुन ने अपनी दिव्य दृष्टि से भगवान का यह उग्र रूप देखा - जिसके उनके मुख से विकराल ज्वालायें निकल रही हैं। इस दृश्य को देखने के लिए दिव्य दृष्टि चाहिए। इस को देखने बाद अर्जुन ने देखा की भगवान का यह उग्र-स्वरूप तीनों लोकों को व्यथित कर रहा है।

This space between heaven and earth is pervaded by Thee alone, also all the quarters (directions of the sky) O Exalted One, when this wonderous, terrible form of Thine is seen, the three worlds tremble. (Ish Upanishad verse 1- ॐ ईशा वास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् - All this, whatsoever exists in the universe is covered by the Lord.) रामचरितमानस ७.१ सीय राम मय सब जग जानी।

अब अर्जुन अपने गुरु भगवान श्री कृष्ण को महात्मा कह कर संबोधित करता है अभी तक तो अर्जुन भगवान के विश्व रूप से मंत्रमुग्ध या सम्मोहित था अब वह भगवान के उग्र स्वरूप को भी देख रहा है अर्जुन अचंभित है सारा ब्रह्माण्ड भगवान् के चेतन स्वरूप से भरा हुआ है

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक २१ –

अमी हि त्वां सुरसङ्‍घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति।

सवस्ति इति उक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्‍घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥२१॥

अमी हि सुर-सङ्‍घा त्वाम् विशन्ति केचित् भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति वे ही देवताओं के समुदाय आप में प्रविष्ट हो रहे हैं। उनमें कई तो भयभीत होकर हाथ जोड़ों हुए आपका नामों और गुणों का गुण-गान याने कीर्तन कर रहे हैं। 

महर्षि सिद्ध-सङ्‍घा: स वस्ति इति उक्त्वा पुष्कलाभिः स्तुतिभिः त्वाम् स्तुवन्ति – महर्षियों और सिध्दों के समुदाय “कल्याण हो-मंगल हो” ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रों के द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं। 

वे ही देवताओं के समूह आप में प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते हैं तथा महर्षि और सिध्दों के समुदाय 'कल्याण हो' ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं

Yonder holts of gods enter Thee and some, in fear, extol Thee, with folded hands, and bands of great seers and perfected ones cry “hail” and adore Thee with hymns of abounding praise. The spiritual hosts adore His glory and are lost in ecstatic worship.

अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से कहा रहे हैं की हे प्रभो मैं (सुर-सङ्‍घा) – सारे देवी देवताओं को आपके मुख में प्रवेश करते देख रहा हूँ। कुछ लोग डर के मारे आपका नाम जप रहे हैं, सारे सिद्ध – साधु आपकी स्तुति गाते हुए आपका स्वागत करते हुए स्वस्ति। स्वस्ति – याने कल्याण हो - कल्याण हो, कह रहे हैं। परमात्मा का यह रूप तो किसी भी देवी देवता ने पहले कभी देखा नहीं था। आज ब्रह्म का उग्र रूप देख कर सब काँप रहे हैं। अर्जुन भगवान् का सम्मोहित और भयावह दोनों स्वरूप का देवताओं द्वारा गुणगान देख कर अचंभित है। जन्म से लेकर मृत्यु तो आधा सर्किल है, यह सब अर्जुन ने एक पल मात्र में देखा।

अर्जुन देख रहा है की मनुष्यों की तो बात छोड़ो – देवता लोग भी थर - थर काँप रहे है, और हाथ जोड़ कर परमात्मा की प्रार्थना कर रहे हैं।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक २२ –

रुद्रादित्याः वसवः ये साध्याः विश्वे अश्विनौ मरुतः ऊष्मपाः।

गन्धर्व यक्ष असुर सिद्ध सङ्घाः वीक्षन्ते त्वाम् विस्मिताः एव सर्वे ॥२२॥

ये रुद्रादित्याः वसवः साध्याः विश्वे च अश्विनौ च मरुतः ऊष्मपाः – जो ग्यारह रूद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, बारह साध्य गण, दस विश्वेदेव और दो अश्विनी कुमार तथा उनचास मारुत गण और गरम-गरम भोजन करने वाले सात पितृ गण;  

च गन्धर्व यक्ष असुर सिद्ध सङ्घाः सर्वे एव विस्मिताः त्वाम् वीक्षन्ते – तथा गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिध्दों के समुदाय हैं, वे सभी चकित होकर आपको देख रहे हैं।

जो ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य तथा आठ वसु, साध्य-गण, विश्वेदेव, अश्विनी कुमार तथा मरुद्गण और पितरों का समुदाय तथा गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिध्दों के समुदाय हैं - वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते हैं।

अब अर्जुन उन सब लोगों को देख रहा है जो भगवान का विराट स्वरूप देख रहे हैं. इसमें ११ रूद्र, १२ आदित्य, ८ वसु, साध्य-गण, विश्व-देव, अश्विनी कुमार, मारुत-गण, सारे पितर, गन्धर्व, यक्ष, असुर, सारे सिद्ध-पुरुष. सभी आश्चर्य से भगवान का यह विश्व रूप देख रहे हैं। (वायु पुराण, अध्याय ६८, श्लोक ३१-३२, शिव पुराण अध्याय ६३ श्लोक २)

The Rudras, the Adityas, the Vasus, the sadhyas; the Visvedevas, the two Asvins, the Maruts and the Manes and the hosts of Gandharvas, Yaksas, Asuras and Siddhas, all gaze at Thee and are quite amazed.

अर्जुन बहुत ही आश्चर्य और भयभीत हो कर भगवान का स्वरूप देख रहा है। अभी उसका भय दूर नहीं हुआ है। यथार्थ को जानने वाले को भय नहीं लगता। रुद्र, आदित्य, वसु,, साध्य-गण, विश्व-देव, अश्विनी कुमार तथा मारुत-गण, पितरों का समुदाय, गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय सब ही विस्मित और भयभीत होकर भगवान् का यह स्वरूप देख रहे हैं।

यदि आपको वास्तविक सच्चे ज्ञान और भय से विमुक्ति चाहिए तो आप को अहंकार, “मैं” Ego, से बाहर निकलना पड़ेगा। ऊपर बताये गए सभी प्रकार के देवता – उप देवता सभी को मनुष्य योनी में आना पड़ता है मोक्ष प्राप्ति के लिए। मनुष्य योनी में है अहम याने मैं, अहंकार का नाश करने की क्षमता है। भक्ति पूर्ण, ज्ञानपूर्ण, होने से ego का नाश संभव है। गोस्वामी तुलसीदासजी कृत रामचरित मानस के उत्तरकाण्ड में स्वयं भगवान राम कहते हैं कि बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।" अर्थात बड़े भाग्य से, अनेक जन्मों के पुण्य से यह मनुष्य शरीर मिला है।(मानस उत्तर काण्ड ४२.४)

कल्याण हो – कल्याण हो – कल्याण हो ....

अर्जुन अपनी दिव्य दृष्टि से दृश्य देख रहा है उन्हें वह श्रीकृष्ण के बारे में कहता है कि हे कृष्ण! मैं आपका आदि, मध्य, और अन्त रहित, अनन्त सामर्थ्य. अनन्त भुजा वाले, चन्द्र-सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुख वाले और अपने तेज से इस जगत को संतृप्त करते हुए देखता हूँहे महात्मन्‌! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अति-व्यथा को प्राप्त हो रहे हैंदेवताओं के समूह आप में प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते हैं तथा महर्षि और सिध्दों के समुदाय 'कल्याण हो' ऐसा उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैंसभी रुद्र और आदित्य तथा वसु, साध्य-गण, विश्व-देव, अश्विनी कुमार तथा मरुद्गण और पितरों-समुदाय, तथा गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिध्दों के समुदाय हैं - वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते हैं।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक २३

रूपम् महत् ते बहुवक्त्रानेत्राम् महाबाहो बहुबाहूरुपादम्।

बहूदरम् बहुदंष्ट्रा करालम् दृष्टवा लोकाः प्रव्यथिताः तथा अहम् ॥२३॥

महाबाहो – हे बलिष्ठ भुजाओं वाले श्रीकृष्ण!

ते बहु वक्त्र नेत्राम् बहु बाहूरुपादम् बहूदरम् बहुदंष्ट्रा करालम् – आपके बहुत मुखों और नेत्रों वाले, बहुत भुजाओं, जंघाओं और चरणों वाले, बहुत उदर (पेट) वाले और बहुत विकराल दाढों वाले;

महत् रूपम् दृष्टवा लोकाः प्रव्यथिताः तथा अहम् – महान रूप को देख कर सब प्राणी व्यथित हो रहे हैं, तथा मैं भी व्यथित हो रहा हूँ।

हे महाबाहो! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुत हाथ, जंघा और पैरों वाले, बहुत उदर वाले और बहुत-सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल महान रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।

Seeing Thy great form, of many mouths and eyes, O Mighty-armed, of many arms, thighs, and feet, of many bellies, terrible with many tusks, the worlds tremble and so do I.

This is a poetic exaggeration to bring out the universality and the omnipresence of the Supreme.

अर्जुन अभी भगवान के सभी आयामों को एक साथ देख रहा है। भगवान की चरम उत्कृष्टता, और उग्रता, उनके बहुत सारे मुख, आँखें, बाजू, जांघें, और जबड़े, वाला भयावह स्वरूप। अर्जुन इस रूप को देख कर भय से कांपने लगा। उसने भगवान का यह स्वरूप कल्पना में भी पहले नहीं देखा था। इस स्वरूप की अनुभूति को वह समझ नहीं पा रहा था। भगवान – महाकाल, महा विकराल, और महा भयानक भी हो सकते  है। भारत में इस रूप को महा-काली के रूप में भी देखा है। एक माँ का इतना विकराल स्वरूप भी हो सकता है। ममता की मूर्ति इतनी उग्र हो सकती है। जिन्दगी और मृत्यु, प्यार और बिछड़ना एक साथ।

अर्जुन यहाँ श्रीकृष्ण को विष्णु (विष्णु के ८ वे अवतार) कह कर संबोधित करता है। वह भगवान को अपनी व्याकुलता बताता है। अभी तक अर्जुन ने श्रीकृष्ण के प्यार, करुणा, सौम्यता, सुन्दर और आनंद मय स्वरूप को देखा था। परन्तु यहाँ तो उसके विपरीत ही स्वरूप नजर आ रहा है।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक २४

नभःस्पृशम् दीप्तम् अनेकवर्णम् व्यात्ताननम् दीप्त विशाल नेत्राम्।

दृष्टवा हि त्वाम् प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिम् न विन्दामि शमम् च विष्णो ॥२४॥

हि विष्णो दीप्तम् अनेकवर्णम् नभःस्पृशम् व्यात्ताननम् दीप्त विशाल नेत्राम् – क्योंकि हे विष्णु! आपके दैदीप्यमान अनेक वर्ण हैं, आप आकाश को स्पर्श कर रहे हैं अर्थात सब तरफ से बहुत बड़े हैं, आपका मुख फैला हुआ है, आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं। 

त्वाम् दृष्टवा प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिम् च शमम् न विन्दामि – ऐसे आपको देख कर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धैर्य और शान्ति को प्राप्त नहीं हो रहा हूँ याने अशान्त हो रहा हूँ।

क्योंकि हे श्रीकृष्ण रूप विष्णु! आकाश को स्पर्श करने वाले, दैदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ।

When I see Thee touching the sky, blazing with many hues, with the mouth opened wide, and large glowing eyes, my inmost soul trembles in fear and I find neither steadiness nor peace, O Visnu!

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक २५

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्टवा एव कालानलसन्निभानि।

दिशः न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास  ॥२५॥

ते करालानि सन्नि-भानि च दंष्ट्राकरालानि मुखानि दृष्टवा – आपके प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित और दाढ़ों के कारण विकराल याने भयानक मुखों को देख कर मुझे;  

न दिशः जाने च न शर्म एव लभे देवेश जगन्निवास प्रसीद - न तो दिशाओं का ज्ञान हो रहा है और न ही शान्ति मिल रही है। इसलिए हे देवेश, देवताओं कभी ईश्वर! हे समस्त जगतों के आश्रयदाता आप प्रसन्न होए।   

दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलय-काल (Doomsday) की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ याने दिशा-भ्रमित हो रहा हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ याने अशांत और दुखी हो रहा हूँ। इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! हे समस्त ब्रह्मांड के आश्रय दाता, आप प्रसन्न हों।

काल-अनल-सन्निभ – प्रलयकाल की धधकती ज्वालाओं के समान प्रज्वलित

When I see Thy mouths terrible with their tusks, like Times’s devouring flames, I lose sense of the directions and find no peace. Be gracious, O Lord of gods, Refuse of the world.

कालानल – literally the doomsday fire.

Arjuna loses his bearings. The tremendous experience has in it elements of astonishment, terror and rapture.

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक २६ – २७

अमी च त्वाम् धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सह एव अवनिपालसंघैः।

भीष्मः द्रोणः सूतपुत्राः तथा असौ सह अस्मदीयैः अपि योधमुख्यैः  ॥२६॥

वक्त्राणि ते त्वरमाणाः विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि केचित्

विलग्नाः दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैः उत्तमांगैः ॥२७॥

अस्मदीयैः योधमुख्यैः सह भीष्मः द्रोणः अपि सूतपुत्राः अपि – हमारे पक्ष के मुख्य-मुख्य योद्धाओं के सहित भीष्म, द्रोण, और वह कर्ण भी;

त्वाम् अवनिपाल संघैः सह धृतराष्ट्रस्य अमी एव सर्वे पुत्राः ते – आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं, राजाओं के समुदाय के सहित धृतराष्ट्र के वे ही सब-के सब पुत्र आपके;

दंष्ट्राकरालानि भयानकानि वक्त्राणि त्वरमाणाः विशन्ति – विकराल दाढ़ों वाले  भयंकर मुखों में बड़ी तेजी से प्रविष्ट हो रहे हैं,

केचित् चूर्णितैः उत्तमांगैः दशनान्तरेषु विलग्नाः संदृश्यन्ते – और उनमें से कई एक की तो पूर्ण रूप से चबा दिए जाने के कारण चूर्ण के समान बनी हुई उनकी सिर की हड्डियाँ आपकी दांतों में फँसी हुई देख रहा हूँ।

वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश कर रहे हैं और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित सबके सब आपके दाढ़ों के कारण विकराल भयानक मुखों में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरों सहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दिख रहे हैं।

All yonder sons of Dhrtarastra together with the hosts of kings and also Bhisma and Karna along with the chief warriors on our side too,--

Are rushing into Thy fearful mouths set with terrible tusks. Some caught between the teeth are seen with their heads crushed to powder.

गीता अध्याय ११ श्लोक २५ से २७ की डॉ प्रणव पंड्या द्वारा व्याख्या:

अर्जुन के समान भगवान श्री कृष्ण को कोई भी प्रिय नहीं है भगवान का यह विकराल रूप अर्जुन को बहुत ही डरावना लगा अर्जुन को अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि जो वह देख रहा है वो सत्य है एक जीवन दाता मृत्यु दाता भी हो सकता है। यह तो भयानक सत्य है।

अस्मदीयैः अपि सह ते योध-मुख्यैः दंष्ट्रा-करालानि भयानकानि वक्त्राणि – हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित आपके दाढ़ों के कारण विकराल भयानक मुखों में,

त्वरमाणाः विशन्ति केचित् चूर्णितैः उत्तम-अङ्गैः सह दशन-अन्तरेषु वि-लग्नाः सन्दृश्यन्ते - बड़े वेग से दौड़ते हुए, प्रवेश कर रहे हैं, कई एक चूर्ण – चूर-चूर हुए, दाँतों के बीच में चिपके हुए दीख रहे हैं।

अर्जुन श्रीकृष्ण से कहता है, ‘हे भगवान मैं आपके दाढ़ों वाले विकराल और प्रलय-काल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को (काल-अनल सन्निभानि) सब तरफ देख कर दिशा-भ्रमित हो रहा हूँ। मैं पूर्ण रूप से अशांत हो गया हूँ।

कृपया मुझ पर अपनी कृपा कर मेरे मन को शांत करें और मुझे आपका सदा प्रसन्न स्वरूप दिखाएँ।

अर्जुन, भगवान को कह रहा है कि, दिशो न जाने, न लभे च शर्म – न दिशा-ज्ञान हो रहा है और न ही सुख का अनुभव हो रहा है यह अर्जुन की पीड़ा की मनोदशा है। १२ साल के वनवास और १ साल का अज्ञातवास में अर्जुन के द्रौपदी और अपने चारों भाइयों के साथ बहुत दुःख झेलें है। अभी तक कोई राज्य धृतराष्ट्र से नहीं मिला और मिला तो यह महा-समर (युद्ध)। इस भावात्मक पीड़ा के बीच भगवान भी अब भयावह हो गए हैं। अर्जुन को अब कोई शांति का छोर नजर नहीं आ रहा। मगर, भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को मृत्यु के रूप में महाकाल की अनुभूति करा रहें हैं। कोई साधारण मनुष्य भगवान का यह भयानक स्वरूप स्वीकार नहीं कर सकता। पर श्रीकृष्ण जानते थे कि अर्जुन इस रूप के दर्शन के बाद और परिपक्व हो जायेगा।

अर्जुन अब भगवान को कहते हैं कि, अब मैं समझ गया हूँ की आप वास्तव में कौन हैं। धृतराष्ट्र के सारे पुत्र, सारे युद्ध की इच्छा से आये राजा लोग, आपके विकराल मुख में प्रवेश कर रहे हैं। भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण के साथ - साथ पांडव पक्ष के भी महान योद्धा भी भगवान के मुख में प्रविष्ट हो कर काल को प्राप्त हो रहे हैं। 

मृत्यु रूपी परमात्मा ने अर्जुन के मन को विचलित कर दिया। अर्जुन को दिशा-भ्रम होने लगा। वह भगवान से कहना चाहता है कि अब इस स्वरूप को बदल कर स्वाभाविक रूप में आ जायें।

अर्जुन भगवान से कहते हैं कि, ‘हे जगत में निवास करने वाले सबके परमेश्वर मुझ पर प्रसन्न होओ।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक २८

यथा नदीनाम् बहवः अम्बुवेगाः समुद्रम् एव अभिमुखाः द्रवन्ति तथा।

तव अमी नरलोकवीराः विशन्ति वक्त्राणि अभिविज्वलन्ति  ॥२८॥

यथा नदीनाम् बहवः अम्बुवेगाः समुद्रम् एव अभिमुखाः द्रवन्ति जैसे नदियों के बहुत से जल प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र के सम्मुख दौड़ते हैं,

तथा अमी नरलोकवीराः तव अभिविज्वलन्ति वक्त्राणि विशन्ति – ऐसे ही वे संसार के महान शूरवीर आपके सब तरफ से दैदीप्यमान मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

जैसे नदियों के बहुत-से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र के ही सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे नर लोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

As the many rushing torrents of rivers race towards the ocean, so do these heroes of the world of men rush into Thy flaming mouths.

यहाँ अर्जुन भगवान को एक उदाहरण द्वारा बताने का प्रयत्न करता है। अर्जुन अपने आराध्य भगवान श्रीकृष्ण का एक नया विकराल रूप देख कर चिंतित होकर कहता है, ‘जैसे सारी नदियाँ समुद्र की तरफ तीव्र वेग से बह रही हैं,  वैसे ही इस नर लोक के सारे बहादुर योद्धा भगवान के मुख में तेजी से प्रवेश करने के लिए धकेले जा रहे हैं.’ नर-लोक-वीराः वक्त्राणि विशन्ति. और यह दृश्य यह बतलाता है कि ये योद्धा अपने आप को मृत्यु को समर्पित कर रहे हैं।

मृत्यु और वो भी परमात्मा के मुख में? अर्जुन को यह विनाशकारी स्थिति लगी की जीवन देने वाला ही अपने मुख से जीवन को निगल रहा है। सामान्यतः लोगों इस बात पर विश्वास नहीं कर पाएंगे, कि बचाने वाला ही मारने वाला है। दुःख का कारण भी परमात्मा और मृत्यु का कारण भी वही परमात्मा! कल्पना के परे बात है। संत कबीर को भी यही अनुभव हुआ था

कबीर कहते हैं, ‘चलती चक्की देखि के दिया कबीरा रोय, दुई पाटन के बीच में साबित बचा न कोय।’

समुद्र सारी नदियों को अपने में समाहित कर लेता है। बंगाल की खाड़ी हो या अरब सागर हो या कहीं भी सागर हो। समुद्र का वाष्पीकरण से बादलों में समा जाता है। फिर ये बादल ही वर्षा के रूप में जमीन पर बरसते हैं। इन से नदियों में पानी आता है और ये नदियाँ अंत में वापस समुद्र में समा जाती हैं। यही जीवन यात्रा है। सागर नदियों का जीवन दाता भी है और मृत्यु दाता भी। इसी प्रकार परमात्मा जीवन दाता भी है और मृत्यु दाता भी है।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक २९

यथा प्रदीप्तम् ज्वलनम् पतंगाः विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।

तथा एव नाशाय विशन्ति लोकाः तव अपि वक्त्राणि समृद्धवेगाः  ॥२९॥

यथा पतंगाः नाशाय समृद्धवेगाः प्रदीप्तम् ज्वलनम् – जैसे पतंगे मोह वश अपना नाश करने के लिए बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रज्वलित अग्नि में प्रविष्ट होते हैं, 

तथा एव लोकाः अपि नाशाय समृद्धवेगाः तव वक्त्राणि विशन्ति – ऐसे से ये सब लोग भी मोह वश अपना नाश करने के लिए बड़े वेग से दौड़ते हुए आपके मुख में प्रविष्ट हो रहे हैं।

जैसे पतंग मोह वश नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अति वेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अति वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं।

As moths rush swiftly into a blazing fire to perish there, so do these men rush into Thy mouths with great speed to their own destruction.

These beings blinded by their own ignorance are rushing to their destruction and the Divine Controller permits it, as they are carrying out the effects of their own deeds. The free activities subject us to their results. As this law of cause and consequence is an expression of the Divine mind, the Divine may be said to execute the law.

The writer points out through the conception of the world-form how the whole cosmos with its vastness, beauty and terror, gods, blessed souls, animals, plants are there in the plenitude of God’s life. God cannot move outside Himself, having all within Himself.

We, human being, who think discursively, are occupied, now with one object and now with another. We think consecutively but the Divine mind knows all as one. There is no past to it nor future.

जैसे एक पतंगा जलती हुई आग को देख कर उसमें जलने के लिए दौड़ पड़ता है, उसी प्रकार सारे मनुष्य भी मृत्यु की ज्वाला में जलने के लिए परवश है। यह बात अर्जुन को अब समझ में आई। यह जीवन का सच्चा अनुभव था। जलाते हुए दीये की लो पतंगे को वशीभूत कर देती है। उसे उसका अंत मालूम है पर वो परवश है। और जो दूसरे पतंगें है वे भी अपना परिणाम जानते हुए भी ज्वाला में कूदने के लिए मजबूर हैं। यह क्रिया निरंतर चलती रहती है।

महान योद्धा, पंडित, ज्ञानी, सभी को अर्जुन मृत्यु के मुख में जाते हुए देख रहा है। उनकी इस हराकिरी (hara-kiri) या कहें आत्महत्या को देख कर अर्जुन चकित है। कबीर कहते हैं, ‘मरो ऐ जोगी मरो, मरो मरण है मीठा. (मरौ हे जोगी मरौ मरौ मरण है मीठा। तिस मरणी से जग मरे मेरे मन आनंद) कितना सुन्दर दार्शनिक विचार है मृत्यु के बारे में।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ३०

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्तात् लोकान् समग्रान् वदनैः ज्वलद्भिः।

तेजोभिः आपूर्य जगत् समग्रम् भासः तव उग्राः प्रतपन्ति विष्णो  ॥३०॥

ज्वलद्भिः वदनैः समग्रान् लोकान् ग्रसमानः समन्तात् लेलिह्यसे – आप अपने प्रज्वलित मुखों द्वारा सम्पूर्ण लोकों का ग्रसन करते हुए उन्हें सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं;

विष्णो – हे विष्णु रूप श्रीकृष्ण!

तव उग्राः भासः तेजोभिः समग्रम् जगत् आपूर्य प्रतपन्ति – आपका उग्र प्रकाश अपने तेज से सम्पूर्ण जगत को परिपूर्ण करके सबको तपा रहा है।

आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं। हे विष्णो! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत को तेज द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।

Devouring all the worlds on every side with Thy flaming mouths, thou lickest them up. Thy fiery rays fill this whole universe and scorch it with their fierce radiance, O Vishnu!

दो भाव है यहाँ। एक तो आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं। और दूसरा आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत को तेज द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है। (प्रतपन्ति) यह भगवान का अति भयावह और अजीब रूप सारे लोकों को जला रहा है। सब तप रहे हैं, जल रहे हैं, सब भस्म हो रहे हैं

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ३१

गीता अध्याय १० के श्लोक १४ में अर्जुन ने श्रीकृष्ण को परम ब्रह्म मान लिया। फिर श्लोक १७ में अर्जुन के प्रार्थना कि केषु- केषु भावेषु माया चिन्त्यः असि – हे भगवान मैं आपका किन-किन या किस-किस भावों या रूपों में चिन्तन या ध्यान करूँ? आप विस्तार से कहिये, क्योंकि सिर्फ सुनने से मेरी तृप्ति नहीं हो रही है।

गीता अध्याय ११ के पहले श्लोक में अर्जुन बोले- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन अर्थात उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है।

श्लोक ३ और ४ में अर्जुन कहते हैं, ‘हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।’

“हे प्रभो! यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना सम्भव हो सकता है - ऐसा आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर! उस अविनाशी स्वरूप का मुझे दर्शन कराइए।”

भगवान द्वारा दी हुए दिव्य दृष्टि से जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण का भयावह विराट रूप देखा तो वे समझ नहीं पाए की आखिर कृष्ण हैं कौन? इसलिए अर्जुन बोले हे श्रीकृष्ण:  

आख्याहि मे कः भवान् उग्ररूपः नमः अस्तु ते देववर प्रसीद विज्ञातुम्।

इच्छामि भवन्तम् आद्यम् न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥३१॥

मे आख्याहि उग्ररूपः भवान् कः देववर ते नमः अस्तु – मुझे यह बताइये कि उग्र रूप वाले आप कौन हैं? हे देवताओं में श्रेष्ठ आपको नमस्कार हो!

प्रसीद आद्यम् भवन्तम् विज्ञातुम् इच्छामि हि तव प्रवृत्तिम् न प्रजानामि – आप प्रसन्न होइये। आदि रूप आपको मैं तत्त्व से जानना चाहता हूँ; क्योंकि मैं आपकी प्रकृति को भलीभांति नहीं जानता।

मुझे बतलाइए कि आप उग्र-रूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होए। आदि पुरुष आपको मैं विशेष रूप तत्त्व से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।

Tell me who Thou art with form so terrible? Salutation to Thee, O Thou Great Godhead, have mercy I wish to know Thee (who art) the Primal One, for I know not Thy working.

The disciple seeks for deeper knowledge.

अर्जुन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण एक इस उग्र रूप को देख कर उनसे पूछता है कि आप वास्तव में कौन हो? मेरे हिसाब से आप देव या सर्वोच्च देव हो, मैं आप को प्रणाम करता हूँ, कृपया मेरा साष्टांग प्रणाम स्वीकार करें। मैं आपकी वास्तविक प्रकृति को नहीं जानता, आपका इरादा या मंशा क्या है, आपकी प्रवृत्ति क्या है? मैं नहीं जानता कृपया मुझे बताने की कृपा करें। इससे मुझे थोड़ी शांति मिलेगी क्योंकि जो मैंने देखा है उससे मैं डर गया हूँ। अर्जुन की यह विशेषता है कि वह शुद्ध मन वाला कपट रहित पारदर्शी व्यक्ति है। इसी वजह से वह एक बच्चे की तरह अपने गुरु से अपने मन से सच्चे भावों को बता रहा है। अर्जुन श्रुति (वेद – उपनिषद) से पूरी तरह से वाकिफ था। वह श्रीकृष्ण के साथ बहुत समय रहा, उसे महात्मा भीष्म और अनेक साधु संतो की संगत का अवसर मिला था। श्रीकृष्ण की अनेकों विभूतियों के बारे में उसने अध्याय १० में स्वयं भगवान के मुख सुन चूका था। पर भगवान के (ब्रह्म) के बारे में उसके मन भी अभी भी शंका थी। वह जानना चाहता था भगवान क्या हैं न की वो क्या कर सकते है।

अगले तीन श्लोक में भगवान कृष्ण उसे बताते है की वे कौन हैं। उनकी क्या मंशा है, और वे अर्जुन को यह सब ज्ञान क्यों बताना चाहते है।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग के ३१ वे श्लोक में भगवान के भयावह उग्र रूप देख कर डरे हुए अर्जुन ने पुछा, “मे आख्याहि उग्ररूपः भवान् कः – हे उग्र रूप वाले आप वास्तव में कौन हो और आपका उद्देश्य क्या है?

तब भगवान ने कहा मैं कालोअस्मीमैं काल हूँ और लोकक्षयकृत् प्रवृद्धः मैं सम्पूर्ण लोकों को नष्ट करने आया हूँ - तुम्हारे प्रतिपक्ष में खड़े सभी योद्धा मेरे द्वारा मारे जाने वाले हैं। अर्जुन के अध्याय २.९ में कहा था “न योत्स्ये”, मैं युध्द  नहीं लडूंगा। श्रीकृष्ण कहा रहे हैं अर्जुन तू युध्द लड़े या नहीं लड़े, पर तेरे प्रतिपक्ष में खड़े सभी योद्धा तो मारे जायेंगे या मारे जा चुके हैं। अतः तेरे लिए यही उचित है कि तू इन लोगों को मारने का श्रेय ले और इस धरती का राज्य भोग।    

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ३२

भगवान उवाच

कालः अस्मि लोकक्षयकृत् प्रवृद्धः लोकान् समाहर्तुम् इह प्रवृत्तः,

ऋते अपि त्वाम् भविष्यन्ति सर्वे ये अवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः  ॥३२॥

भगवान उवाच – श्री भगवन बोले-

कालः अस्मि प्रवृद्धःमैं काल हूँ और आगे बड़ा हुआ हूँ;

लोकक्षयकृत् – सम्पूर्ण जगत का नाश करने वाला;

लोकान् समाहर्तुम् इह प्रवृत्तः – इन सब लोगों का संहार करने के लिए यहाँ आया हूँ।

प्रत्यनीकेषु ये योधाः अवस्थिताः सर्वे त्वाम् ऋते अपि न भविष्यन्ति – तुम्हारे प्रतिपक्ष में जो योद्धा लोग खडें हैं, वे सब तुम्हारे युद्ध किये बिना भी नहीं रहेंगे।  

श्री भगवान बोले- मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। इसलिए जो प्रति पक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जाएगा।

Time am I, world-destroying, grown mature, engaged here in subduing the world. Even without thee (thy action), all the warriors standing arrayed in the opposing armies shall cease to be.

Kala or time is the prime mover of the universe. If God is thought of as time, then He is perpetually creating and destroying. The Supreme Being takes up the responsibility for both creation and destruction. He Gita does not countenance the familiar doctrine that, while God is responsible for all that is good, Satan is responsible for all that is evil. If God is responsible for mortal existence, then He is responsible for all that it includes, life and creation, anguish, and death.

God has control over time because He is outside of it and we also shall obtain power over time if we rise above it. As the force behind this, He sees father than we, knows how all events are controlled and so tells Arjuna that causes have been at work for years and are moving towards their natural effects which we cannot prevent by anything we can do now. The destruction of his enemies is decided irrevocably by acts committed long ago. There is an impersonal fate, what the Christian call Providence, a general cosmic necessity, Moira which is an expression of a side of God’s nature and so can be regarded as the will of His sovereign personality, which pursues its own unrecognizable aims. Against it, all protestations of self-determination are of no avail.  

यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि, मैं समय का देवता हूँ, मैं महाकाल हूँ। मैंने इस संसार से सारी अनैतिकता को समाप्त करने का प्रण किया है। मैं सरे लोकों को नष्ट करने आया हूँ। लोकान समाहर्तुमिह प्रवृत्तः (लोकान् - समस्त लोगों को; समाहर्तुम् - नष्ट करने वाला; प्रवृत्तः - लगा हुआ)

यहाँ भगवान अर्जुन को अपना भयंकर स्वरूप जो उन्होंने शुरू में बताया था दिखाते हैं जिसे देख कर अर्जुन डर गया था। भगवान् युद्ध भूमि में उपस्थित सभी को जानते हैं। वे दुर्योधन की तरफ खड़े लोगो की ओर इशारा भी करते हैं और अर्जुन से कहते हैं कि तुम उन्हें मारो या न मारो, ये तुम्हारे सम्बन्धी लोग और कौरवों का नाश तो निश्चित है। क्योंकि दुष्टों का संहार ही तो भगवान की प्रतिज्ञा है। अर्जुन को इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि वो युध्द कर रहा है। असलियत में तो स्वयं भगवान् महाभारत का युद्ध लड़ रहे हैं।

कालोऽस्मि – मैं काल हूँ; भगवान यह नहीं कहा रहे हैं कि मै ब्रह्मा हूँ, या शिव हूँ या फिर विष्णु हूँ या और कोई देवता हूँ। सीधा उत्तर है, सर्वज्ञ, सर्वत्र, और सर्वशक्तिमान काल हूँ। जो किसी को नहीं छोड़ता। वे सर्वोच्च हैं। काल यानि समय। काल, कर्म और स्थान ये हम सब से आपस में जुड़े हुए हैं। इन तीनों के कारण ही ये सब लोग इस युद्ध भूमि में एकत्र हुए हैं। काल ने कुरुक्षेत्र को स्थान चुना हैं। ये सारे लोग अपने कर्मो के चरमसीमा पर पहुँच चुके हैं। (काल से मिलाने के लिए परिपक्व हो गए हैं) इनके बुरे कर्मो का निपटारा करने के लिए स्वयं भगवान उपस्थित हैं। मैं प्रवृद्धः – (महान) महा काल हूँ. कर्मों की गति ही काल का आकार प्रकार निश्चित करती है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में भी रोग, दुःख, दयनीयता और क्षमता का हनन, हम रोज देखते है। सामूहिक बुराइयों के नाश के लिए युद्ध, और प्राकृतिक आपदा जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। जैसे आज ISIS एक सामाजिक बुराई के रूप में आई है, भूकंप, बाढ़, सूखा और महामारी का फैलना- ये सामूहिक नाश की स्थिति है. अगर समाज में अच्छाई का बाहुल्य है तो राम राज्य जैसी शांति और प्रगति की स्थिति होगी।

इस श्लोक में भगवान अर्जुन से कहते हैं कि, तुम इन्हें मारो या न मारो, ये तो सब मरने वाले है। इन्हें तुम नहीं मार रहे हो बल्कि इनका अपना कर्म ही इनके नाश का कारण है। दुर्योधन के कर्म और भीष्म और द्रोणाचार्य का चुप रहना उन्हें पाप का भागीदार बना देता है और उन्हें महाकाल का शिकार बना देता है।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ३३

तस्मात् त्वम् उत्तिष्ठ यशः लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यम्

समृद्धम् मया एव एते निहताः पूर्वम् एव निमित्तमात्राम् भव सव्यसाचिन्  ॥३३॥

तस्मात् त्वम् उत्तिष्ठ यशः लभस्व – इसलिए तुम युद्ध के लिए खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो तथा,

शत्रून् जित्वा समृद्धम् राज्यम् भुङ्क्ष्व – शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोगो।

एते एव मया पूर्वम् एव निहताः सव्यसाचिन् निमित्तमात्राम् भव – ये सभी मेरे द्वारा पहले से हो मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन अर्थात दोनों हाथों से बाण चलाने वाले अर्जुन! तुम इनको मारने वाले निमित्त मात्र बन जाओ।

अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन! (दोनों हाथों - बायें हाथ से भी से भी बाण चलाने का अभ्यास होने से अर्जुन का नाम 'सव्यसाची' हुआ था) तू तो केवल निमित्त मात्र बन जा।

Therefore, arise thou and gain glory. Conquering thy foes, enjoy a prosperous kingdom. By Me alone they slain already. Be thou merely the occasion, O Savyasacin Arjuna.

The God of destiny decides and ordains all things and Arjuna is to be the instrument, the flute under the fingers of the Omnipotent One who fulfils His own purpose and is working out a mighty evolution. Arjuna is self-deceived if he believes that he should act according to his own imperfect judgment. No individual soul can encroach on the prerogative of God. In refusing to take up arms, Arjuna is guilty of presumption. (Gita chapter 18 verse 58).

निमित्तमात्राम् – merely the occasion. The writer seems to uphold the doctrine of Divine predestination and indicate the utter helplessness and insignificance of the individual and the futility of his will and effort. The decision is made already and Arjuna can do nothing to change it. He is a powerless tool in the God’s hands, and yet there is the other note that God is not arbitrary and capricious but just and loving. How are the two to be reconciled?

The numinous idea of the pre-destinating and solely acting God which includes in us the feeling of the utter dependence on God, the “wholly other” standing over against us in absolute antithesis, is here expressed. The intense intuition of the power of God comes out here and in Job and in Paul: “Shall the thing formed say to Him that formed it, why hast thou made me thus?”

We need not look upon the whole cosmic process as nothing more than the unfolding of a predetermined plan, the unveiling of a ready-made scenario. The writer here is not so much denying the unforeseeable-ness of human acts as affirming the meaning of eternity in which all the moments of the whole time, past, present, and future, are present to the Divine Spirit. The radical novelty of each moment of evolution in time is not inconsistent with Divine Eternity.

The ideas of God are worked out through human instrumentality. If we are wise, we so act that we are instruments in His hands. We allow Him to absorb our soul and leave no trace of the ego. We must receive His command and do His will with the cry “In thy will is our peace”; ”Father, into Thy hands I command my spirit.” (Luke xxiii,46).

Arjuna should feel, “Nothing exists save Thy will. Thou alone art the doer and I am only the instrument.” The dread horror of the war repels him. Judged by human standards, it is quite incomprehensible but when the curtain is lifted, so as to reveal the purpose of the Almighty, he acquiesces in it. What he himself desired, what he might hope to gain in this world or the next do not count any more. Behind this world of space-time, interpenetrating it, is the creative purpose of God. We must understand that supreme design and be content to serve it. Every act is a symbol of something far beyond itself.    

यहाँ निमित्त-मात्रम् भव प्रमुख शब्द है। इस श्लोक में महाकाल का यह परम वाक्य है। अब यह अर्जुन का कर्तव्य बन जाता है। उसे तो अब निमित्त बनना है, और कर्म की सारी जिम्मेदारी भगवान् पर छोड़ देना है। अगर अभी भी अर्जुन के मन में शंका है तो उसे श्रीकृष्ण का यह वाक्य याद रखना चाहिए जब भगवान कहते है, ‘मयैवैते निहताः पूर्वमेव’ – (मया एव एते निहताः पूर्वम् एव) – ये सब पहले ही मेरे द्वारा निश्चय ही मारे गये है। मैं इन्हें पहले ही मार चूका हूँ. उनके जीने की इच्छा ख़त्म हो गयी है। सिर्फ उनका शरीर ही बचा है।

जिस भी समाज, संस्कृति, या सभ्यता ने भगवान् के अस्तित्व को नकारा है, उनका नाश हो गया है। श्री कृष्ण के साथ सिर्फ पांडव ही थे. कृष्ण अर्जुन से कहते है, तुम चिंता मत करो. उठो, जागो, रुको मत, युद्ध करो और यश को प्राप्त करो। महाबली लोगों को उनके कर्म ने पहले ही मार दिया है। इस अवसर को अपने हाथ से जाने मत दो। यह सही समय है कि तुम मेरे निमित्त बन जाओ। मैं परमात्मा, श्रीकृष्ण तुम्हें आज्ञा देता हूँ. मेरी आज्ञा का पालन करो।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ३४

द्रोणम् भीष्मम् जयद्रथम् कर्णम् तथा अन्यान् अपि योधवीरान्

मया हतान् त्वम् जहि मा व्यथिष्ठाः युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥३४॥

द्रोणम् भीष्मम् जयद्रथम् कर्णम् तथा अन्यान् अपि मया हतान् – द्रोण, और भीष्म, तथा जयद्रथ और कर्ण तथा अन्य सभी मेरे द्वारा मारे हुए हैं।

योधवीरान् त्वम् जहि मा व्यथिष्ठाः युध्यस्व रणे सपत्नान् जेतासि – इन शूरवीरों को तुम मारो। तुम व्यथा मत करो। और युद्ध करो। युद्ध में तुम निःसंदेह बैरियों को जीतोगे।

Slay Drona, Bhisma, Jayadratha, Karna and other great warriors as well, who are already doomed by Me. Be not afraid. Fight, thou shalt conquer the enemies in battle. 

मया हतान् – doomed by me. God knows the direction of their lives and their appointed goal. There is nothing however small or insignificant that has not been ordained or permitted by God, even to the fall of a sparrow.

Arjuna is asked to assume the office of Providence. He will be externally master of nature and inwardly superior to all possible accidents.

गीता अध्याय २ के शुरुवात में अर्जुन ने भीष्म और द्रोणाचार्य को मारने में अपनी असमर्थता बताई थी, और कहा था कि इन जैसे महा पुरुषों को मैं कैसे मार सकता हूँ? कथम् भीष्मम् अहम् सङ्ख्ये द्रोणम् च मधुसूदन!

गुरून अहत्वा हि महानुभवान, श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यम अपि इह लोके, - ऐसे महापुरुषों को जो मेरे गुरु हैं, उन्हें मार कर जीने की अपेक्षा इस संसार में भीख माँग कर खाना अच्छा है।

ऐसा कहकर अर्जुन ने “न योत्स्य इति गोविन्दम उक्त्वा तूष्णीम बभूव ह।“ हे गोविन्द मैं युध्द नहीं करूँगा कह कर धनुष बाण रथ में रख दिए।  

श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि है अर्जुन जिन लोगों को मारने में तुझे संकोच हो रहा था उन सब को मैं पहले ही मार चूका हूँ। तू ने स्वयं इन लोगों को मुझ में समाते हुए देखा है। इन सब की आत्मा तो मेरे पास है, बस एक शरीर का ढांचा है, और वो भी मार गिराएँ जायेंगे। इसलिए उठ और युध्द कर।   

सभी महावीर द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, जयद्रथ, कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा सूक्ष्म रूप से मारे हुए है। अब अर्जुन तेरा कर्म हे की तू इन शूरवीर योद्धाओं को तू मार। भय मत कर। निःसंदेह तू युद्ध में बैरियों को जीतेगा। इसलिए युद्ध कर। युध्यस्व – युद्ध लड़ो। ये सब जो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं उन्हें अर्जुन तुम पूर्ण रूप से नष्ट करो। मैं तुम्हारे पीछे खड़ा हूँ। चिंता मत करो। उन सबका बल मैंने पहले ही छीन लिया है, और तेरे पास मेरा बल है। तू मेरा शिष्य है इसलिए मुझ पर विश्वास कर।

यह सारा दृश्य एक मनोवैज्ञानिक युद्ध की तरह है जिसमें अर्जुन को अपने गुरु की शक्ति का प्रतिबिम्ब बनाया जा रहा है। अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण युध्द की बुनियादी शिक्षा दे रहे हैं। तीन प्रमुख बाते – नीति, नियति और निमित्त। नीति का मतलब जीवन का विधान – प्रकृति के साथ जीना या उसके विरुद्ध जीना। नियति – नीति द्वारा निश्चित की जाती है। भगवान सबकी नियति जानते हैं। वे अर्जुन को बताते है कि, ये सारे महावीर मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। दुर्योधन और उसके साथियों का पाप का घड़ा भर चूका है। अर्जुन को तो मुफ्त में यश का भागीदार बनने का मौका मिल रहा है। मत चुको अर्जुन!

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ३५ 

(भयभीत हुए अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति और चतुर्भुज रूप का दर्शन करने के लिए प्रार्थना)

संजय उवाच

एतत् श्रुत्वा वचनम् केशवस्य कृताजलिः वेपमानः किरीटी ।

नमस्कत्वा भूयः एव आह कृष्णम् सगद्गदम् भीतभीतः प्रणम्य ॥३५॥

केशवस्य एतत् वचनम् श्रुत्वा वेपमानः किरीटी नमस्कत्वा – भगवान केशव का यह वचन सुनकर भय से कांपते हुए एक दिव्य मुकुट धारी अर्जुन हाथ जोड़कर नमस्कार करके; और

भीतभीतः एव भूयः प्रणम्य सगद्गदम् कृष्णम् आह – भयभीत होते हुए भी फिर से प्रणाम करके गदगद वाणी से भगवान् कृष्ण से बोले।

संजय बोले- केशव भगवान के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपते हुए नमस्कार करके, फिर भी अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गद्‍गद्‍ वाणी से बोले।

मुकुट की कहानी महाभारत के विराट पर्व ४४/१७ में वर्णित है।

Sanjay said: Having heard this utterance of Kesava Krsna, Kiritin Arjuna, with folded hands and trembling, saluted again and prostrating himself with great fear, spoke in a faltering voice to Krsna.

Rudolf Otto gives this whole scene as an example of the place of the numerous, the mysterium tremendum in religion. It presents to us the transcendent aspect of God.

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ३६ 

अर्जुन उवाच

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यति अनुरज्यते च।

रक्षांसि भीतानि दिशः द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥३६॥

अर्जुन उवाच

हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यति च अनुरज्यते – हे अन्तर्यामी भगवन्! आपके नाम, गुण और लीला का कीर्तन करने से यह सम्पूर्ण जगत हर्षित हो रहा है और आपके अनुराग (प्रेम) को प्राप्त हो रहा है।

भीतानि रक्षांसि दिशः द्रवन्ति च सर्वे सिद्धसंघाः नमस्यन्ति स्थाने – और आपके नाम, गुण, आदि के कीर्तन से भयभीत होकर राक्षस लोग दासों दिशाओं में भागते हुए जा रहे हैं, और सम्पूर्ण सिध्द-संघ याने सिध्द-गण आपको नमस्कार कर रहे हैं क्योंकि आपको इस रूप में देख कर यह सब होना उचित ही है।

हृषीक ईश – इन्द्रियों के स्वामी

अर्जुन बोले- हे अन्तर्यामिन्! यह योग्य ही है कि आपके नाम, गुण और प्रभाव के कीर्तन से जगत अति हर्षित हो रहा है और अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षस (भूत, प्रेत, पिशाच आदि) लोग दिशाओं में भाग रहे हैं और सब सिद्ध-गणों के समुदाय नमस्कार कर रहे हैं।

जहां लोग अपने प्रतिदिन के कामों में राक्षसों के भय को दूर भागने वाले भगवान के नाम गुण लीला आदि के श्रवण, और कीर्तन नहीं करते, वहीँ ऐसी राक्षसियों शक्तियों का बल चलता है। (श्री भागवत १०/६/३)

Arjuna said: O Hrisikesa Krishna, rightly does the world rejoice and delight in glorifying Thee. The Raksasas are fleeing in terror in all directions and all the hosts of perfected ones are bowing down before Thee in adoration.

In an ecstasy of adoration and anguish, Arjuna praises the Supreme. He sees not only the destructive power of Time but also the spiritual presence and law governing the cosmos. While the former produces terror, the latter gives rise to a sense of rapturous ecstasy and he pours forth his soul in utter adoration.

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ३७ 

कस्मात् च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणः अपि आदिकत्र्रो।

अनन्त देवेश जगन्निवास त्वम् अक्षरम् सत् असत् तत्परम् यत् ॥३७॥

महात्मन् गरीयसे च ब्रह्मणः अपि आदिकत्र्रो ते कस्मात् न नमेरन्

हे महात्मन् ! गुरुओं के भी गुरु और ब्रह्मा के भी आदि-कर्ता आपके लिए (वे सिध्द-गण) नमस्कार क्यों नहीं करें?

अनन्त देवेश जगन्निवास त्वम् अक्षरम् सत् असत् तत्परम् यत् – क्योंकि हे अनन्त! हे देवेध! हे जगन्निवास ! आप अक्षर स्वरूप हैं; आप सत् भी हैं और असत् भी हैं और उनसे याने सत्-असत् से परे भी जो कुछ भी, वह भी आप हैं.

हे महात्मन्‌! ब्रह्मा के भी आदि-कर्ता याने आदि-पुरुष और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्‌, असत्‌ और उनसे परे अक्षर अर्थात सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही हैं।

गरीयसे – पतंजलि महाराज ने कहा है कि वे परमात्मा पहले – से- पहले जो ब्रह्मा आदि प्रकट हुए हैं, उनके भी गुरु हैं – पूर्वेषाम् अपि गुरुः – योगदर्शन १.२६।

And why should they not do Thee homage, O Exalted One, who art greater than Brahma, the original creator? O Infinite Being, Lord of the gods, Refuge of the universe. Thou art the Imperishable, the being and the non-being and what is beyond that.

आदि-कर्ता Thou art the First of creator, or Thou art the creator of Brahma.

जगन्निवास: the Refuse of the universe. The God in whom dwells the universe.

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ३८ 

त्वम् आदिदेवः पुरुषः पुराणः त्वम् अस्य विश्वस्य परम् निधानम्।

वेत्ता असि वेद्यम् च परम् च धाम त्वया ततम् विश्वम् अनन्तरूप  ॥३८॥

त्वम् आदिदेवः च पुराणः पुरुषः त्वम् अस्य विश्वस्य परम् निधानम् - आप ही आदिदेव और पुराण पुरुष हैं तथा आप ही इस संसार के परम आश्रय हैं।

वेत्ता वेद्यम् च परम् धाम असि अनन्तरूप त्वया विश्वम् ततम् – तथा आप ही सबको जानने वाले, जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप ! आप से ही सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।

आप आदि-देव और सनातन पुरुष हैं, आप इन जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप ! आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात परिपूर्ण हैं।

Thou ae the First of gods, Primal Person, the Supreme Resting Place of the world. Thou art the knower and that which is to be known and the supreme goal. And by Thee is this universe pervaded, O Thou of infinite form!

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ३९ 

वायुः यमः अग्निः वरुणः शशांक प्रजापतिः त्वम् प्रपितामहः च।

नमः नमः ते अस्तु सहस्त्राकृत्वः पुनः च भूयः अपि नमः नमः ते ॥३९॥

त्वम् वायुः यमः अग्निः वरुणः शशांक प्रजापतिः च प्रपितामहः – आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, दक्ष आदि प्रजापति और प्रपितामह याने ब्रह्मा जी के भी पिता हैं;

ते सहस्त्राकृत्वः नमः अस्तु नमः च पुनः अपि ते भूयः नमः नमः – आपको हजारों बार नमस्कार हो! नमस्कार हो! और फिर भी आपको बार-बार नमस्कार हो! नमस्कार हो !

आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपके लिए हजारों बार नमस्कार! नमस्कार हो! आपके लिए फिर भी बार-बार नमस्कार! नमस्कार!

Thou art Vayu the wind, Yama the destroyer, Agni the fire, Varuna the sea-God, and Sasanka the moon., and Prajapati, the grandsire of all. Hail, hail to Thee, a thousand times. Hail, hail to Thee again and yet again.

According to some, “Prajapati and the grandsire of all.”

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ४० 

नमः पुरस्तात् अथ पृष्ठतः ते नमः अस्तु ते सर्वतः एव सर्व।

अनन्तवीर्य अमितविक्रमः त्वम् सर्वम् समाप्नोषि ततः असि सर्वः ॥४०॥

सर्व ते पुरस्तात् नमः अथ पृष्ठतः ते सर्वतः एव नमः अस्तु – हे सर्व स्वरूप ! आपको आगे से भी नमस्कार हो, और पीछे से भी नमस्कार हो! आपको सब ओर से याने सभी दासों दिशाओं से भी नमस्कार हो;

अनन्तवीर्य अमितविक्रमः त्वम् सर्वम् समाप्नोषि ततः सर्वः असि – हे अनन्तवीर्य याने अनन्त बलशाली तेजस्वी, अत्यन्त पराक्रमी, आपने सबको एक देश में समेट रख है; अतः सब कुछ आप ही हैं। 

हे अनन्त सामर्थ्य वाले! आपके लिए आगे से और पीछे से भी नमस्कार! हे सर्वात्मन्‌! आपके लिए सब ओर से ही नमस्कार हो, क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किए हुए हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं।

Hail to Thee in front, hail to Thee behind and hail Thee on every side, O All; boundless in power and immeasurable in might, Thou dost penetrate all and therefore Thou art All.

The Supreme dwells everywhere, within, without, above, below and around and there is no place where He is not.

Mundaka Up, II.2.II; What is luminous, what is subtler than the subtlest, and in which all the worlds and those that live in them are fixed, is this Imperishable Brahman.

Chandogya Up, VII.25. "That infinite, indeed, is below. It is above. It is behind. It is before. It is to the south. It is to the north. The Infinite, indeed, is all this.

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ४१-४२  

सखा इति मत्वा प्रसभम् यत् उक्तम् हे कृष्ण हे यादव हे सखे इति।

अजानता महिमानम् तव इदम् मया प्रमादात् प्रणयेन वा अपि  ॥४१॥

यत् च अवहासार्थम् असत्कृतः असि विहार शय्या आसन भोजनेषु

एकः अथवा अपि अच्युत तत्समक्षम् तत् क्षामये त्वाम् अहम् अप्रमेयम् ॥४२॥

तव इदम् महिमानम् अजानता सखे इति मत्वा मया प्रमादात् वा प्रणयेन अपि प्रसभम् – आपकी इस महिमा को न जानते हुए “मेरे सखा हैं” ऐसा मानकर मैंने प्रमाद से अथवा प्रेम से भी हठ-पूर्वक बिना सोचे-समझे;

हे कृष्ण हे यादव हे सखे इति यत् उक्तम् – मैंने आपको हे कृष्ण !, हे यादव !, हे सखे ! इस प्रकार जो कुछ कहा है; 

च अच्युत अवहासार्थम् विहार शय्या आसन भोजनेषु एकः अथवा तत्समक्षम् यत् असत्कृतः असि -  और हे अच्युत ! हंसी – दिल्लगी में, चलते-फिरते, सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते समय, अकेले अथवा उन सखाओं कुटुम्बियों आदि के सामने, मेरे द्वारा आपका जो कुछ तिरस्कार या अनजाने में अपमान किया गया है; तो -

अप्रमेयम् यत् असत्कृतः असि अप्रमेयम् तत् त्वाम् अहम् क्षामये – हे अप्रमेय स्वरूप ! (जिसकी माप न हो सके) वह सब या उन सब अज्ञान में किये गये संबोधनों के लिए मैं आप से क्षमा माँगता हूँ।

आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण !', 'हे यादव !' 'हे सखे !' इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात्‌ कहा है और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिए विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किए गए हैं - वह सब अपराध अप्रमेय स्वरूप अर्थात अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा माँगता हूँ।

For whatsoever I have spoken in rashness to Thee, thinking that Thou art my companion and unaware of this fact of Thy greatness, 'O Krsna, O Yadava, O Comrade"; out of my negligence or may be through fondness,

The vision of God produces a deep sense of unworthiness and sin. When Issaiah saw the Lord sitting upon a throne, high and lifted up, he said, “Woe is me! For I am undone; because; because I am a man of unclean lips,… for mine eyes have seen the King, the Lord of Hosts.” (vi,I,5)

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ४३ 

पिता असि लोकस्य चराचरस्य त्वम् अस्य पूज्यः च गुरुः गरीयान्।

न त्वत्समः अस्ति अभ्यधिकः कुतः अन्यः लोकत्राये अपि अप्रतिमप्रभाव  ॥४३॥

त्वम् अस्य चराचरस्य लोकस्य पिता असि पूज्यः च गरीयान् गुरुःआप ही इस चराचर संसार के पिता हैं, आप ही पूजनीय हैं, और आप ही गुरुओं के भी महान गुरु हैं।

अप्रतिमप्रभाव लोकत्राये त्वत्समः अपि अन्यः न अस्ति अभ्यधिकः कुतः – हे अनन्त प्रभावशाली भगवन ! इन तीनों लोकों में आपके सामान भी दूसरा कोई नहीं है (फिर आपसे) अधिक तो हो ही कैसे सकता है !

आप इस चराचर जगत के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं। हे अनुपम प्रभाववाले! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं हैं, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है।

Thou art the father of the world of the moving and the unmoving. Thou art the object of its worship and venerable teacher. None is equal to Thee, how then could there be one greater than Thee in the three worlds, O Thou of incomparable greatness?

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ४४ 

तस्मात् प्रणम्य प्रणिधाय कायम् प्रसादये त्वाम् अहम् ईशम् ईड्यम्।

पिता इव पुत्रास्य सखा इव सख्युः प्रियः प्रियायाः अर्हसि देव सोढुम् ॥४४॥

तस्मात् ईड्यम् त्वाम् ईशम् अहम् कायम् प्रणिधाय प्रणम्य प्रसादये – इसलिए स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को मैं शरीर से लंबा पड़कर प्रणाम करके (दण्डवत प्रणाम ) आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ।

पिता इव पुत्रास्य सखा इव सख्युः प्रियः प्रियायाः देव सोढुम् अर्हसि – जैसे एक पिता पुत्र के , सखा जैसे सखा के (मित्र – मित्र के ) और पति अपनी पत्नी के किये अपमान को सह लेता है, ऐसे ही हे देव आप मेरे द्वारा किया गया अपमान को आप सहने अर्थात क्षमा करने में समर्थ हैं।

अतएव हे प्रभो! मैं शरीर को भलीभाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, - स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिए प्रार्थना करता हूँ। हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं- वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य हैं।

Therefore, bowing down and prostrating my body before Thee, Adorable Lord, I seek Thy grace. Thou, O God, shouldst bear with me as a father to his son, as a friend to his friend, as a lover to his beloved. 

God as Father is a familiar conception to the Hindu. Rg. Veda says: “Be of easy approach to us, even as a father to his son. Do thou, O Self-effulgent Lord, abide with us and bring blessings to us.” I,I,I,9

Again, Yajurveda says: “O Lord, thou art our father; do thou instruct us like a father.” XXXVII 20.

The Old Testament uses the image of the father. “Like as a father pitieth his children, so the Lord pitieth them that fear him.” (Psalm ciii,13 and also Lxviii,5) The idea of God as father becomes the central conception in the teaching of Jesus.

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ४५ 

अदृष्टपूर्वम् हृषितः अस्मि दृष्टवा भयेन च प्रव्यथितम् मनः।

मे तत् एव मे दर्शय देवरूपम् प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥४५॥

अदृष्टपूर्वम् दृष्टवा हृषितः अस्मि च भयेन मे मनः प्रव्यथितम् – जिसको पहले कभी नहीं देखा, उस रूप को देख कर मैं हर्षित हो रहा हूँ और साथ-ही-साथ भय से मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा है । अतः आप;  

मे तत् एव देवरूपम् दर्शय देवेश जगन्निवास प्रसीद – मुझे अपने उसी देवरूप ( शान्त विष्णु रूप को दिखाइए। हे देवेश! हे जग्न्निवास ! आप प्रसन्न होइये।

मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुझे दिखलाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए।

I have seen what was never seen before and I rejoice but my heart is shaken with fear. Show me that other previous form of Thine, O God and be gracious, O Lord of the gods and Refuge of the Universe!

There is not only the form of the Transcendent and Universal Being which is so terrifying in some of its aspects but also the form of Personal God, a mediating symbol of Godhead which is so reassuring to the terrified mortal. Arjuna, who is unable to stand the blinding blaze of light that devastates Krsna’s whole being, wishes to see the more pleasing form. The Light which for ever shines beyond the worlds is also the Light within, the teacher and friend in his own heart.

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ४६ 

किरीटिनम् गदिनम् चक्रहस्तम् इच्छामि त्वाम् द्रष्टुम् अहम्।

तथा एव तेन एव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥४६॥

अहम् त्वाम् तथा एव किरीटिनम् गदिनम् चक्रहस्तम् द्रष्टुम् इच्छामि – मैं आपको वैसे ही मुकुटधारी गदाधारी और हाथ में चक्र लिए हुए अर्थात चतुर्भुज रूप में देखना चाहता हूँ।

सहस्रबाहो विश्वमूर्ते तेन एव चतुर्भुजेन रूपेण भव – इसलिए हे सहस्त्रबाहो ! हे विश्वमूर्ते ! आप उसी चतुर्भुज रूप से (शंख-चक्र-गदा–पद्म सहित) हो जाइये।    

मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किए हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ। इसलिए हे विश्वस्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुज रूप से प्रकट होइये।

I wish to see Thee even as before with Thy crown, mace, and disc in Thy hand. Assume Thy four-armed shape, O Thou of a thousand arms and of universal form.

Arjuna is asking Krsna to assume the shape of Visnu of whom He is said to be an incarnation.

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ४७

(भगवान द्वारा अपने विश्वरूप के दर्शन की महिमा का कथन तथा चतुर्भुज और सौम्य रूप का दिखाया जाना)

श्रीभगवानुवाच

मया प्रसन्नेन तव अर्जुन इदम् रूपम् परम् दर्शितम् आत्मयोगात्

तेजोमयम् विश्वम् अनन्तम् आद्यम् यत् मे त्वदन्येन दृष्टपूर्वम् ॥४७॥

अर्जुन – हे अर्जुन !

मया प्रसन्नेन आत्मयोगात् मे इदम् परम् तेजोमयम् – मैंने प्रसन्न होकर अपनी सामर्थ्य से मेरा यह अत्यन्त श्रेष्ठ, तेजस्वरूप;

आद्यम् अनन्तम् विश्वम् रूपम् तव दर्शितम् यत् त्वदन्येन दृष्टपूर्वम् – सबका आदि और अनन्त विश्व-रूप तुझे दिखाया है, जिसको तुम्हारे सिवाय पहले किसी ने नहीं देखा है।

श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरे परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराट रूप तुझको दिखाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसी ने पहले नहीं देखा था

The Blessed Lord said:

By My grace, through My divine power; O Arjun, was shown to thee this supreme form, luminous, universal, infinite and primal which none but thee has seen before.

This vision is not the final goal of the man’s search; in that case the Gita would have ended here. The fleeting vision must become a permanent experience of the seeker.

Trance or samadhi is neither the end nor an essential element of religious life. The blinding flashes, the ecstatic flights must be transmuted into permanent faith.

Arjun cannot any more forget the thrilling scene he saw but he has to work it into his life. The vision only opens; it does not enhance. Even as we test and confirm what we see by the eye, by the evidence of other senses, the knowledge acquired by the vision required to be completed by the other elements of life. 

श्री भगवान ने अर्जुन को कहा कि, हे मेरे प्रिय अर्जुन, मेरे इस विराट रूप को जिसको तुमने अभी देखा है, उसे आज तक किसी ने भी नहीं देखा इस विराट रूप को पूर्णरूप से देखना और अनुभव करना दोनों ही अत्यंत कठिन है मैंने, तुम्हारे व्यक्तित्व और व्यक्तिगत जीवन को जो अनुभूति और जागरूकता की दिव्य दृष्टि दी है इस कारण तुम मेरे इस रूप को देख पाए

हम सब टुकड़ों में जिंदगी जीते हैं मैं, तुम, मेरा और आपका ने जिंदगी को कई हिस्सों में बाँट दिया है यहाँ तक की जीवन और मरण जैसी घटनाओं ने जिंदगी की निरंतरता को तोड़ दिया है हम जिंदगी की पूर्णता और उसके विविध स्वरूप का अनुभव नहीं कर पाते इस असंभव कार्य को भगवान नारायण ही संभव कर सकते है

श्रीकृष्ण का पूरा जीवन चमत्कारों से भरा हुआ है जन्म से लेकर पर यह विराट स्वरूप के दर्शन एक दुर्लभ से भी दुर्लभ घटना है यह घटना एक बार माता यशोदा के साथ हो चुकी है यहाँ श्रीकृष्ण को परम परमात्मा परम ब्रह्म का स्वरूप लेना पड़ा यह उनकी चैतन्यता का चरम बिंदु था

हम सब परमात्मा तो हैं ही उपनिषद कहते है, पूर्णता में से पूर्ण निकाल भी लेंगे तो भी पूर्ण बचा रहेगा हम लोग अभी अपूर्ण भगवान स्वरूप है अभी अंश मात्र हैं इस पूर्णता को प्राप्त करने की यात्रा पर हैं यही भगवान श्री कृष्ण योगारूढ़ हो कर अनुभव करायाक्षुद्रता को तोड़े बिना विराट का अनुभव संभव नहीं है।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ४८

वेदयज्ञाध्ययनैः दानैः क्रियाभिः तपोभिः

उग्रैः एवंरूपः शक्यः अहम् नृलोके द्रष्टुम् त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥४८॥

कुरुप्रवीर – हे कुरुश्रेष्ठ !

नृलोके एवंरूपः अहम् न वेदयज्ञाध्ययनैः – नर – मनुष्य लोक में इस प्रकार के विश्वरूप वाला मैं, न वेदों के पाठ से, न यज्ञों के अनुष्ठान से, न शास्त्रों के अध्ययन से,

दानैः न उग्रैः तपोभिः न क्रियाभिः – न दान से, न उग्र तपों से, और न मात्र क्रियाओं से;

त्वदन्येन द्रष्टुम् शक्यः – तेरे (कृपा पात्र के) सिवाय और किसी के द्वारा देखा जा नहीं सकता हूँ। अर्थात तेरे को छोड़ कर और किसी को भी मेरा यह स्वरूप किसी भी प्रकार से भले ही दान हो, यज्ञ हो, या तप कर के भी नहीं देखा जा सकता। 

हे अर्जुन! मनुष्य लोक में इस प्रकार विश्व रूप वाला मैं न वेद और यज्ञों के अध्ययन से, न दान से, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से ही तेरे अतिरिक्त दूसरे द्वारा देखा जा सकता हूँ।

Neither by the Vedas, nor by sacrifices or by study nor by ceremonial rites nor by severe austerities can I with this form be seen in the world of men by any one else but thee, O hero of the Kurus Arjun.

यह दृष्टांत अपने आप एक इकलौती घटना थी, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अपना विचित्र विराट स्वरूप अर्जुन को दिखाया। कृष्ण तो मिल जायेंगे पर अर्जुन बनना अत्यंत कठिन काम है। इस समय श्रीकृष्ण अपनी योग, ज्ञान, और चैतन्यता की चरम सीमा पर हैं। कृष्ण बनने के लिए तो हमें परमात्मा की परम सत्ता का स्वयं अपने अंदर अनुभव करना है। पर अर्जुन बनने के लिए तो किसी और पर गहरा विश्वास करना पड़ता है। यह सबसे कठिन कार्य है। ईसा को, महावीर को, और बुद्ध को भी अर्जुन जैसा कोई नहीं मिला। इसलिए इसे दुर्लभ से भी दुर्लभ घटना माना गया है। अपने अहंकार को पूर्ण रूप से नष्ट करके भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण सिर्फ अर्जुन ही कर सकता है।

इसलिए श्रीकृष्ण कहते है, “मुझे वेदों के गहरे अध्ययन से या योगाभ्यास से, अपना सम्पूर्ण दान देने से, या फिर कोई और यौगिक क्रिया और तपस्या द्वारा भी नहीं देखा जा सकता। क्योंकि इन सब में अहंकार रहता है।

अर्जुन बनने के लिए तो श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण ही चाहिए। ये समर्पण की भावना मीरा, तुलसी, और सूरदास जी में थी।

श्रीकृष्ण तो एक हवा का झोंका है, और अर्जुन की नाव एक खुले पाल वाली नाव है। खुले हुए पाल समर्पण की भावना है। अब स्वयं श्रीकृष्ण उसकी नाव को गति और दिशा दे रहे हैं।

हम सब को भी अर्जुन की तरह अहंकार मुक्त होना चाहिए।

Neither by the Vedas, nor by sacrifices nor by study nor by gifts nor by ceremonial rites nor by severe austerities can I with this form be seen in the world of men by anyone else but thee, O hero of the Kurus Arjuna.

भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के व्यक्तित्व में एक विशेष चमक / रौनक / प्रतिभा देखी। अर्जुन कर्मशील भी है और भाव-शील भी है। महान धनुर्धर और योद्धा होने पर भी उसे कोई अहंकार नहीं था। उसे श्री कृष्ण पर पूरा भरोसा था. इसी वजह से अर्जुन, भगवान श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पित था। अर्जुन जब-जब मौका मिला उसने श्री कृष्ण को ही चुना। कृष्ण के साथ होने पर भी उसने जीवन बहुत यातना और दुःख सहे पर उसने कृष्ण का साथ नहीं छोड़ा। इसीलिए भगवान श्री कृष्ण ने अपना यह विश्व रूप उसको दिखाया।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ४९

मा ते व्यथा मा विमूढभावः दृष्टवा रूपम् घोरम् ईदृक् मम इदम्

व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनः त्वम् तत् एव मे रूपम् इदम् प्रपश्य ॥४९॥

इदम् मम ईदृक् घोरम् रूपम् दृष्टवा ते व्यथा मा च विमूढभावः मा – यह मेरा इस प्रकार का उग्र रूप देख कर तुझे व्यथा नहीं होनी चाहिए और विमूढ़ भाव भी नहीं होना चाहिए।

व्यपेतभीः प्रीतमनाः त्वम् पुनः तत् एव मे इदम् रूपम् प्रपश्य - अब निर्भय और प्रसन्न मन वाला होकर तू फिर उसी मेरे इस चतुर्भुज रूप को अच्छी तरह देख ले।

मेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिए और मूढ़-भाव भी नहीं होना चाहिए। तू भयरहित और प्रीति-युक्त मन वाला होकर उसी मेरे इस शंख-चक्र-गदा-पद्म-युक्त चतुर्भुज रूप को फिर देख।

May you not be afraid, my you not be bewildered seeing this terrific form of Mine. Free from fear and glad at heart, behold again this other (former) form of Mine.

श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन, मैं फिर से तेरे द्वारा पसंद / स्वीकार किया हुआ मेरे उस रूप को तू देख। अर्जुन श्री कृष्ण के विकराल रूप से भयभीत सा हो गया था। असल में परमात्मा का विराट स्वरूप हमारी अपनी करुणामयी माता के समान है। माँ की हर सांस में बच्चे का जीवन है। हर माँ अपने बच्चे के बिना व्याकुल और अशांत रहती है।

व्यक्ति और विराट का आपस में गहरा सम्बन्ध है। कोई माँ हमें क्यों डराना चाहेगी। भगवान् अर्जुन से कहते हैं, हे अर्जुन तू व्याकुल मत हो वो, डरो मत, मेरा चतुर्भुज रूप को फिर से देखो। ऐसा कह कर श्री कृष्ण चतुर्भुज स्वरूप में आ गए।

गीता अध्याय ११ के श्लोक ४६ में अर्जुन ने भगवान के विराट रूप के दर्शन के बाद उनके विष्णु रूप को देखने के लिए प्रार्थना करी।

मे तत् एव देवरूपम् दर्शय देवेश जगन्निवास प्रसीद – मुझे अपने उसी देवरूप (शान्त विष्णु रूप) को दिखाइए। हे देवेश! हे जग्न्निवास ! आप प्रसन्न होइये। मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किए हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ। इसलिए हे विश्वस्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुज रूप से प्रकट होइये।

तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना चतुर्भुज वाला विष्णु रूप दिखाया:

- हे अर्जुन! तेरे अनुग्रह पर मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरे परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराट रूप तुझको दिखाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसी ने पहले नहीं देखा थामनुष्य लोक में मेरे विश्वरूप को न वेद-ज्ञान, न यज्ञों, न दान से, न यौगिक क्रियाओं से भी नहीं देखा जा सकता। मेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिए और मूढ़-भाव भी नहीं होना चाहिए। तू भयरहित और प्रीति-युक्त मन वाला होकर उसी मेरे इस शंख-चक्र-गदा-पद्म-युक्त चतुर्भुज रूप को फिर देख।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ५०

संजय उवाच

इति अर्जुनम् वासुदेवः तथा उक्त्वा स्वकम् रूपम् दर्शयामास भूयः

आश्वासयामास भीतम् एनम् भूत्वा पुनः सौम्यवपुः महात्मा ॥५०॥

वासुदेवः अर्जुनम् इति उक्त्वा भूयः तथा स्वकम् रूपम् दर्शयामास –

वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन से ऐसा कहकर फिर उसी प्रकार से अपना विष्णु-रूप दिखाया।

च महात्मा पुनः सौम्यवपुः भूत्वा एनम् भीतम् आश्वासयामास - और महात्मा श्रीकृष्ण ने पुनः सौम्य रूप मानव रूप होकर इस भयभीत अर्जुन को आश्वासन दिया 

संजय बोले -

भगवान वासुदेव ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखाया और फिर महात्मा श्रीकृष्ण ने द्विभुज सौम्य-मूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुन को धीरज दिया।

Sanjay said:

Having thus spoken to Arjuna, Vasudeva (Krsna) revealed to him His own form. The Exalted One, having assumed again the form of grace, comforted the terrified Arjuna.

गीता अध्याय ११ श्लोक ५० में संजय महाराजा धृतराष्ट्र को युद्ध भूमि का आँखों देखा हाल सुना रहा था। संजय ने कहा कि इतना कह कर श्री कृष्ण ने अपना  सौम्य चतुर्भुज रूप अर्जुन को दिखाया। जिसे देख कर अर्जुन अत्यंत हर्षित हुआ। अर्जुन को भगवान ने आश्वासयामास(आश्वासन दिया) आस-धीरज धराया।

यहाँ पर संजय ने भगवान श्री कृष्ण के लिए दो प्रकार के संबोधन प्रयोग किये। उन्हें भगवान भी कहा और महात्मा भी बताया।

ईशा मसीह ने सूली पर लटकने के समय कहा कि, Thy will be done. और इसी क्षण ईशा परमात्मा के अवतार हो गए।

Jesus said “thy will be done” as part of the Lord’s prayer in Matthew 6:9.

In Matthew 26:39, Jesus prayed along the same lines when he said, “O my Father, if it be possible, let this cup pass from me: nevertheless, not as I will, but as thou wilt.”

Jesus exemplified the attitude of submission to God’s will that we should all strive for. He showed us that it is possible to surrender our desires and follow God’s plan.

भगवान श्री राम हमारी पौराणिक कथाओं में परमात्मा के अंश-अवतार हैं। श्री कृष्ण एक पूर्ण अवतार हैं। जो अलौकिक लीलाएं श्री कृष्ण ने अपने मनुष्य जीवन में की, वे सब किसी एक रूप में कर पाना संभव नहीं था। कई लोगों ने उनका जीवन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की तुलना में त्रुटि पूर्ण पाया। इस के बावजूद भी श्री कृष्ण सबसे ज्यादा पूजे जाते है। भगवान तो हमारे मन में प्रवेश करना चाहते हैं पर हमारी अपनी वासनायें अवरोध पैदा कर देती हैं।

गीता अध्याय ११ श्लोक ५१ से ५५ तक की डॉ प्रणव पंड्या द्वारा व्याख्या:

गीता के ११.४६ से ५० तक के श्लोक में अर्जुन ने भगवान से उनका चतुर्भुज ‘विष्णु’ स्वरूप दिखने के लिए प्रार्थना की। तब श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा- हे अर्जुन! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरे परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराट रूप तुझको दिखाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसी ने पहले नहीं देखा था। मेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिए और मूढ़-भाव भी नहीं होना चाहिए। तू भयरहित और प्रीति-युक्त मन-वाला होकर उसी मेरे इस शंख-चक्र-गदा-पद्म-युक्त चतुर्भुज रूप को फिर देख। भगवान ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखाया और सौम्य-मूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुन को धीरज दिया।

द्विभुज कृष्ण, चतुर्भुज विष्णु, और सहस्त्रभुज रूप विराट तीनों एक ही परब्रह्म के रूप हैं।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ५१

अर्जुन उवाच

दृष्टवा इदम् मानुषम् रूपम् तव सौम्यम् जनार्दन

इदानीम् अस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिम् गतः  ।।५१।।

अर्जुन उवाच -

जनार्दन – हे जनार्दन !

तव इदम् सौम्यम् मानुषम् रूपम् दृष्ट्वा – आपके इस सौम्य मनुष्य रूप को देखकर,

इदानीम् सचेताः संवृत्तः  अस्मि प्रकृतिम् गतः – इस समय स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ।

अर्जुन बोले- हे जनार्दन! आपके इस अति-शांत मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ।

Arjuna said:

Beholding again this Thy gracious human form, O Janardhana (Krsna), I have now become collected in mind and am restored to my normal nature.

डॉ प्रणव द्वारा: हे श्रीकृष्ण आपका अति सौम्य रूप देख कर मैं (अर्जुन) अब पूर्ण रूप से स्थिरचित्त हो गया हूँ। भगवान का चतुर्भुज रूप देखने पर यह अर्जुन के मन का भाव था. अर्जुन कहता है कि अब सचेत और स्थिर चित्त है। यह अर्जुन के व्यक्तित्व को दर्शाता है। भक्त भी मानव है। इसलिए अर्जुन कहता है की मेरे मनुष्य रूप को समझ कर हे श्रीकृष्ण अपना रूप दिखाओ। मैं, मेरे अनुकूल (मेरी समझ में आ सके) ऐसा रूप मुझे दिखाओ।

यहाँ एक सुन्दर कथा तुलसीदासजी से सम्बंधित आती है। यह कथा पहले भी कही जा चुकी है। पर यहाँ उसे दुबारा कहा जा रहा है। एक बार तुलसीदास जी वृन्दावन गए। वहां उनके मित्र नाभा उन्हें ‘बांके-बिहारी’ के मंदिर ले गए। राम भक्त तुलसीदास जी को भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति में पीताम्बर, मयूर मुकुट, बांसुरी, अच्छी नहीं लगी। तुलसीदास जी ने कृष्णजी की मूर्ति को कहा:

मोर मुकुट कटी पीत पट भले बने हो नाथ,

तुलसी मस्तक तब नवे जब धनुष बाण हो हाथ!

क्या कोई भक्त अपने आराध्य देवता से अपना मनचाहा स्वरूप दिखाने को कह सकता है? मगर भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्त तुलसी के लिए धनुष बाण हाथ में लेकर भगवान् राम के रूप में प्रगट हो गए। मूर्ति का स्वरूप ही बदल गया श्रीकृष्ण राम बन गए। यह भगवान् का अपने भक्त के प्रति प्यार है।

अर्जुन ने जब भगवान श्रीकृष्ण को चतुर्भुज विष्णु के रूप में देखा तो उसका मन शांत और स्वाभाविक हो गया। भगवान के विकराल स्वरूप को देख कर अर्जुन भयभीत था। यह अलौकिक और अति-इन्द्रिय स्वरूप था अर्जुन के लिए। पर भगवान भक्त के बस में रहते हैं। मैं मनुष्य हूँ प्रभू आप भी मेरे जैसे बन जाओ।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ५२

सुदुर्दर्शम् इदम् रूपम् दृष्टवान् असि यत् मम।

देवाः अपि अस्य रूपस्य नित्यम् दर्शनकाङ्क्षिणः।।५२।।

मम इदम् यत् रूपम् दृष्टवान असि सुदुर्दर्शम् मेरा यह जो चतुर्भुज रूप देखा है, इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ है।

देवाः अपि अस्य रूपस्य नित्यम् दर्शनकाङ्क्षिणः देवता भी इस रूप को देखने के लिए नित्य लालायित रहते हैं।

श्री भगवान बोले- मेरा जो चतुर्भुज रूप तुमने देखा है, वह सुदुर्दर्श है अर्थात्‌ इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं।

The Blessed Lord said:

This form of Mine which is indeed very hard to see, thou hast seen. Even the gods are ever eager to see this form.

डॉ प्रणव द्वारा: - भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कहते है, ‘मेरे जिस स्वरूप को तुमने देखा है या समझा है, वो बहुत मुश्किल से दिखाई देता है। इस रूप के दर्शन बहुत दुर्लभ हैं – सुदुर्दर्शम् - जिसके दर्शन अत्यंत ही दुर्लभ है। इसे देवता लोग भी नहीं देख सकते, और ये देवता इस प्रकार के रूप को देखने की लालसा रखते है।

अप्रत्यक्ष रूप से श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि भक्त का भगवान पर कितना अधिकार है। देवताओं में उनकी शक्ति का अहम् है। पर भक्त में अहम् का दोष नहीं होता। निर-अहंकारी, निर-अभिमानी, ही भक्ति की डगर पर चल सकता है।

अध्यात्मिक जीवन में या साधना के पथ पर चलने वाले को अपना अहम् भगवान के चरणों में समर्पित करना पड़ता है तभी वो भगवत्ता को प्राप्त कर पाता है। तभी वो निर्वाण को प्राप्त कर सकता है। यह पथ अत्यंत कठिन है। इस पथ पर चलने के लिए भक्त को पल-पल अपने आप को बदलना पड़ता है। इसमें गलती की कोई गुंजाइश नहीं है। कोई वासना, कोई तृष्णा, कोई अभिमान की कोई जगह नहीं है। अगर आप स्वयं सर्जन है और आप को खुद पर आपरेशन करना पड़े तो कितना मुश्किल काम है। एक भक्त के लिए भी यह कार्य मुश्किल है। इसलिए अपने आप को भगवान को समर्पित करना पड़ता है।  हे प्रभो! मैं आपका हूँ, मुझे अपने अनुसार ढालिए. समर्पण बहुत कठिन है, पर एक बार समर्पित हो गए तो मन अपने आप भगवान के अनुरूप बदल ने लगता है। हमारी हर समय यही इच्छा होनी चाहिए कि भगवान स्वयं हमारे जीवन – रथ खुद चलायें।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ५३

जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है - इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जा सकता हूँ।

न अहम् वेदैः न तपसा न दानेन न च इज्यया।

शक्यः एवंविधः द्रष्टुम् दृष्टवान् असि माम् यथा ।।५३।।

यथा माम् दृष्टवान् असि एवंविधः अहम् – जिस प्रकार तुमने मुझे देखा है, इसप्रकार का चतुर्भुज रूप वाला मैं -

न वेदैः न तपसा न दानेन न च इज्यया द्रष्टुम् शक्यः – न तो वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जा सकता हूँ।

This verse is a repetition of verse 48 of this chapter.

The Supreme Lord again said – In the form in which thou hast seen Me now, I cannot be seen either by the Vedas or by austerities or by gifts or by sacrifices.

डॉ प्रणव द्वारा व्याख्या :

यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन, तुमने अभी मुझे जिस रूप में देखा है, मेरा वह रूप ज्ञान से या तप से, न दान से और न ही यज्ञ से देखा जा सकता है। जिन्होंने वेद मंत्रों को याद कर लिया है या जो रोज उन मन्त्रों का पाठ करते हैं, वो मेरे पास पहुंचे यह जरूरी नहीं है। जो वैदिक क्रिया को करते हों, उन्हें नहीं मालूम कि यह मुझ तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त नहीं है। वेद पढ़ते हो तो पढ़ो, कर्मकांड भी करो, पर वेद का मर्म तो जानो। मंत्र - अनुभूति जरूरी है। मंत्र का अर्थ है चित्त के प्रकाश में घुलना चाहिए। इसी प्रकार तप अकेला भी आपको परमात्मा के पास नहीं ले जा सकता। बहुत सारे तपस्वी बोध विहीन रहे। उनकी तपस्या लालसाओं की भेंट चढ़ गयी। उनकी दुर्गति भी हुई।

पतंजलि अपने योग-सूत्र में बताते है, ‘काया इन्द्रियां शुद्धि: अशुद्धि: काश्यः तपसा: २-४३. इसका अर्थ है, शरीर एवम् इन्द्रियां की सिद्धि एवं सभी अशुद्धियों का नास है तप है।

न दान से – दान यश के लिए दिया जाता है। प्रतिष्ठा के लिए दी गयी राशि अभिमान बढ़ाती है।

न ज्यया – यज्ञ से भी नहीं। इसका अर्थ है कि यज्ञ से भी भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकती। यज्ञ का मर्म है “इदम् न मम:” -  नहीं यह आहुति अब मेरी नहीं है। यह तो परब्रह्म परमात्मा के लिए है। सारे कर्मकांड किसी न किसी लालसा के लिए किये जाते है। इसमें स्वार्थ रहता है। यज्ञ का मर्म है लौकिक कामनाओं का नाश करना है। कामनाओं के लिए किये गए यज्ञ बंधन का कारण बनते है।

भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे है कि पार्थ जिस तरह तूने मेरी अनुभूति की वैसी अनुभूति न तो वेद पाठ में है, न तप में है, न दान में है, और न ही यज्ञ में है। तुमने जो देखा वह अत्यंत दुर्लभ है। सच्चा भक्त ही इस दर्शन को देख पाता है। इसलिए भक्ति में शुद्धि होना चाहिए।

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ५४

भक्त्या तु अनन्यया शक्यः अहम् एवंविधः अर्जुन।

ज्ञातुम् द्रष्टुम् च तत्त्वेन् प्रवेष्टुम् च परन्तप  ।।५४।।

तु परन्तप अर्जुन ! - परन्तु हे शत्रु तापन अर्जुन!

एवंविध अहम् अनन्यया भक्त्या तत्त्वेन ज्ञातुम् – इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं केवल अनन्य भक्ति से ही तत्त्व से जानने में;

च द्रष्टुम् च प्रवेष्टुम् शक्यः – और साकार रूप से देखने में तथा प्रवेश (प्राप्त) करने में शाक्य हूँ।

परन्तु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए, तत्व से जानने के लिए तथा प्रवेश करने के लिए अर्थात एकीभाव से प्राप्त होने के लिए भी शाक्य हूँ।

But by unswerving devotion to Me, O Arjuna, I can be thus known, truly seen, and entered into, O Oppressor of the foe Arjuna.

Adi Shankar defines an ideal devotee as one who, realizes by the senses only one object, God. He adores God with all his spirit and heart.

साक्षात्कार or the direct perception of the divine form is possible for the true devotees.

डॉ प्रणव द्वारा : श्रीकृष्ण कहते है, ‘हे श्रेष्ठ तप करने वाले अर्जुन, तेरी  अनन्य भक्ति से, मैं प्रत्यक्ष दर्शन देने के लिए तथा मेरे साथ लीन होने के लिए, मैं सदा उपलब्ध हूँ। भगवान का चतुर्भुज रूप मात्र भक्त की जो कोई आकांक्षा नहीं रखता, उसकी मांग हो सकती है। एक समर्पित भक्त माँ के ह्रदय का सच जानना चाहता है। माँ के गर्भ की शुद्धता. इसे अनन्य भक्ति कहते है। अन – नहीं. अन्य – कोई और।

हमें कोई और नहीं चाहिए। शुद्ध मात्र रूप में वात्सल्य वाले भगवान् चाहिए। यही अनन्य भक्ति है। भगवान् कहते हैं, ऐसा भक्त मेरे साथ एकाकार हो जाता है।

एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास। एक राम घन श्याम हित चातक तुलसीदास (दोहावली २७७)

गीता अध्याय ११ विश्वरूप दर्शन योग श्लोक ५५

मत्कर्मकृत् मत्परमः मद्भक्तः संगवर्जितः।

निर्वैरः सर्वभूतेषु यः सः माम् एति पाण्डव ॥५५॥

पाण्डव – हे अर्जुन !

यः मत्कर्मकृत मत्परमः मद्भक्तः संगवर्जितः – जो मेरे लिए ही कर्म करने वाला, मेरे ही परायण याने आश्रित और मेरा ही प्रेमी भक्त है तथा सर्वथा आसक्ति रहित और,

सर्वभूतेषु निर्वैरः सः माम् एति – प्राणिमात्र के साथ वैर भाव से रहित है, वह भक्त मुझे प्राप्त होता है।

हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्ति रहित है और सम्पूर्ण भूत प्राणियों में वैर भाव से रहित है (सर्वत्र भगवद्बुद्धि हो जाने से उस पुरुष का अति अपराध करने वाले में भी वैर भाव नहीं होता है, फिर औरों में तो कहना ही क्या है), वह अनन्य भक्ति युक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है।

मत्कर्मकृत : - मेरे लिए सब काम करने वाला,

मत्पराम्ः - मेरे ही परायण हो,

मद्भक्तः – मेरा ही भक्त हो,

सङ्‍गवर्जितः – आसक्ति रहित हो,

निर्वैरः सर्वभूतेषु - सभी प्राणियों में भेद भाव से रहित हो,

वो भक्त - स मामेति – मुझे ही प्राप्त होता है।

यहाँ कुछ तथ्य समर्पित भक्तों के लिए सामने आते है।

१. सब कुछ मुझ पर छोड़ दो, प्रेम हो जाने पर भगवान हमारी रक्षा खुद करता है।

२. प्रत्येक कर्म मेरा समझ कर करो।

३. सभी रिश्तों में मात्र भगवान को देखो, यही आसक्ति रहित जीवन है।

४. किसी से भी बैर-भाव मत रखो। सब और परमात्मा ही है फिर बैर कैसा। बैर हमें ही नष्ट कर देता है।

ऐसी भाव दशा हो तो भक्त के पास स्वयं भगवान ढुढंते चले आते है।

यही बात भगवान श्रीकृष्ण ने गीता अध्याय ९ के अंतिम श्लोक में कही थी कि हे अर्जुन - मत् भक्तः भव मत्–मनाः मत् याजी माम् नमस्कुरु – हे अर्जुन तू मेरा भक्त हो जा, मुझमें मन वाला हो जा, मेरा पूजन करने वाला हो जा, और मुझे नमस्कार कर।

एवम् आत्मानम् युक्त्वा मत्-परायणः माम् एव एष्यसि – इस प्रकार अपने-आप को मेरे साथ लगाकर मेरे परायण हुआ तू मुझे ही प्राप्त होगा। (गीता ९.३४)

Commentary by Dr. S Radhakrishnan

He who does work for Me, he who look upon Me as his goal, he who worships Me, free from attachment, he who is free from enmity to all creatures, he goes to Me, O Pandava Arjuna.

This is the essence of bhakti. (Gita 12.13) This verse is the substance of the whole teaching of the Gita. We must carry out our duties, directing the spirit to God and with detachment from all interest in the things of the world and free from enmity towards any living being.

Whatever be our vocation and character, whether we are creative thinkers or contemplative poets or humble men and women with no special gifts, if we possess the one great gift of the love of God, we become God’s tools, the channels of His love and purpose. When this vast world of living spirits becomes attuned to God and exists only to do His will, the purpose of man is achieved.

The Gita does not end after the tremendous experience of the celestial vision. The great secret of the Transcendental Atman, the source of all that is and yet itself unmoved for ever is seen. The Supreme is the background for the never-ending procession of finite things. Arjuna has seen this truth but he has to live in it by transmuting his whole nature into the willing acceptance of the Divine. A fleeting vision, however vivid and permanent its effects may be, is not complete attainment. The search for abiding reality, the quest of final truth cannot end, in emotional satisfaction or fitful experience.

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः

 

 

 

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